‘नवोत्थान’ में प्रधानमंत्री मोदी पर आलेख – लोक-परंपरा के जन जागरण का दौर

नवोत्थान पत्रिका के दिसंबर, 2017 अंक में हरीश चन्द्र बर्णवाल का लिखा आलेख प्रकाशित हुआ था। उसे हुबहू यहां प्रकाशित कर रहे हैं।

“हमारी संस्कृति, हमारी कला, हमारा संगीत, हमारा साहित्य, हमारी विविध भाषाएं, हमारी प्रकृति, हमारा परिवेश, ये सभी हमारी अनमोल विरासतें हैं। कोई भी देश अपनी विरासत को भुलाकर आगे नहीं बढ़ सकता है। हम सभी का कर्तव्य है कि हम अपनी इस अनमोल धरोहर को सहेजें, संभालें और उसे सशक्त करने की दिशा में निरंतर प्रयासरत रहें।

 प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यह कथन नए भारत का सजीव  चित्रण करने के लिए काफी है। पिछले कुछ वर्षों में भारत में लोक-संस्कृति के संवर्धन और विस्तार को लेकर कितने अथक प्रयास हुए हैं और आने वाले वर्षों में ये प्रयास कितना सकारात्मक आकार लेंगे, इसकी झलक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस संकल्प में स्पष्ट दिखती है। दरअसल पिछले छह दशकों में भारत ने एक देश के रूप में कितनी भी प्रगति कर ली हो, लेकिन एक राष्ट्र के तौर पर इसकी सांस्कृतिक पहचान धीरे-धीरे खत्म होती गई। यह संस्कृति विश्व में अपनी विशिष्ठता और गहरी कर सके, यह तो दूर की बात है, इसे बचाए रखने तक के प्रयासों में भी अब से पहले कोई ईमानदारी नहीं बरती गई। जब हम भारतीय संस्कृति की बात करते हैं तो यह बात केवल लोक गायन शैली, लोक नृत्य या पारंपरिक वेशभूषा तक सीमित नहीं होती है। घोर अनदेखी के चलते संपूर्ण रूप से इस महान संस्कृति का ह्रास हुआ है। कभी किसी सरकार ने न तो इसके महत्त्व को पूरी तरह से समझा और न ही इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता महसूस की। सिवाय इतिहास के पन्नों को अपने मनमाने रंग से रंगवाने और अपने को देश से बड़ा समझने के, किसी भी और विषय में उन्होंने दिलचस्पी ही नहीं ली।

पहली बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने बिना किसी वोट बैंक, जाति, धर्म या फिर क्षेत्र का भेदभाव किए लोक-संस्कृति की तरफ भी अपना ध्यान दिया है। ऐसा पहली बार हुआ है, जब मोदी सरकार बनने के बाद इस क्षेत्र के संपूर्ण विकास के लिए गंभीरतापूर्वक चौतरफा प्रयास किए गए हैं।

 

नरेन्द्र मोदी ने लोक-संस्कृति को अपने व्यक्तित्व का हिस्सा बनाया

लोक-संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए किए जाने वाले कार्यों की दिशा में शुरूआत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वयं से की। दरअसल मोदी जानते हैं कि देश का प्रधानमंत्री होने के नाते वे पूरे देश का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे में वोट बैंक की राजनीति से परे होकर, वे जहां भी जाते हैं, वहीं की संस्कृति में रम जाते हैं। बनारसी गमछा हो या फिर असम या हिमाचल की विशेष टोपी, कश्मीरी शॉल हो या फिर तमिलनाडु का अंगवस्त्रम, नरेन्द्र मोदी ने वहीं की स्थानीय वेशभूषा में लिपटी संस्कृति को स्वयं धारण करने की कोशिश की है।

यही नहीं, प्रधानमंत्री बिहार में भोजपुरी भाषा से अपनी बात की शुरुआत करते हैं तो तमिलनाडु में तमिल भाषा में अभिवादन करना नहीं भूलते। इसी तरह किसी भी राज्य में जाते हैं तो वहां के विख्यात लेखकों और कवियों का भी उद्धरण देने की कोशिश करते हैं। प्रधानमंत्री के इस हाव-भाव से स्थानीय संस्कृति का राष्ट्रव्यापी प्रसार होता है और उस प्रदेश के लोग भी प्रधानमंत्री से विशेष आत्मीय जुड़ाव का अनुभव करते हैं।

देश में कोई भी बड़ा आयोजन हो तो उन अवसरों पर प्रधानमंत्री अपनी संस्कृति की महत्ता दिखाना नहीं भूलते हैं। 15 अगस्त या फिर 26 जनवरी, प्रधानमंत्री भारतीय लोक-संस्कृति की परिचायक पगड़ी अवश्य पहनते हैं।

लोक-संस्कृति पर आधारित उत्सवों का आयोजन

प्रधानमंत्री लोक-संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए इससे जुड़े उत्सवों का आयोजन करते रहने पर भी जोर देते हैं। वे कहते हैं, “अधिकांश लोग हमारी संस्कृति की बारीकियों को और उसके विस्तार को समझते हैं, लेकिन आज की युवा पीढ़ी में ज्यादातर को इस बारे में पता नहीं है। यह स्थिति ठीक नहीं।“ जाहिर है, इस स्थिति को बदलने के लिए नरेन्द्र मोदी ऐसे उत्सवों के आयोजन को प्रोत्साहित करते हैं, जहां एक मंच पर संपूर्ण भारतीय लोक-संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने वाले कलाकारों को मौका मिल सके। इन आयोजनों के दौरान ये कलाकार न सिर्फ देश के दूसरे  हिस्सों से जुड़ते हैं, बल्कि उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का भी एक स्वर्णिम अवसर इस रूप में मिल जाता है।

  • भारत पर्व–  वर्ष 2016 में स्वतंत्रता दिवस के मौके पर भारत पर्व का आयोजन किया गया। इसमें 17 राज्यों की पवेलियन थीं, जिनमें संबंधित राज्यों की कला और संस्कृति को प्रदर्शित किया गया था।
  • राष्ट्रीय आदिवासी उत्सव -25 अक्टूबर, 2016 को दिल्ली में राष्ट्रीय आदिवासी उत्सव का आयोजन किया गया। खुद प्रधानमंत्री ने इस उत्सव का उद्घाटन किया था। अपने-आप में अनूठा यह ऐसा पहला अवसर था, जब देश-भर का आदिवासी समुदाय एक साथ, एक मंच पर जुटा।

साफ है, प्रधानमंत्री इन उत्सवों में व्यक्तिगत तौर पर रुचि लेते हैं, जिससे इस तरह के कार्यक्रमों की सफलता कई गुना बढ़ जाती है।

 

‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’

भारतीय लोक-संस्कृति के महत्त्व को पुनर्स्थापित करने और देश के एक हिस्से के लोगों को दूसरे हिस्से की संस्कृति से परिचित कराने के लिए मोदी सरकार ने एक गंभीर कोशिश ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ योजना के जरिये की थी। 31 अक्टूबर, 2016 को शुरू की गई इस योजना के तहत राज्यों के बीच की सांस्कृतिक दूरी को कम करने का प्रयास जारी है। इस कार्यक्रम के तहत 29 राज्यों और 7 केंद्र शासित प्रदेशों को सात भागों में बांटा गया है। ऐसी योजना तैयार की गई है कि एक राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के लोग दूसरे राज्य या केंद्र शासित प्रदेशों में जा सकें और वहां रहकर उनकी संस्कृति, वेशभूषा और भाषा को समझ सकें।

 

दीनदयाल हस्‍तकला संकुल

प्रधानमंत्री मोदी लोक-संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए सिर्फ योजनाएं ही नहीं बनाते हैं, बल्कि उसे रोजगार से जोड़ने का ठोस प्रयास भी करते हैं। वाराणसी स्थित दीनदयाल हस्तकला संकुल इसका एक सशक्त उदाहरण है। प्रधानमंत्री मोदी ने वाराणसी के प्रसिद्ध कारीगरों और बुनकरों को पूरे विश्व से जोड़ने के लिए 7 नवंबर, 2014 को ही इस केंद्र की आधारशिला रखी थी, जो कि 22 सितंबर, 2107 को बनकर सक्रिय हो गया।

इस केंद्र की स्थापना के बाद न सिर्फ वाराणसी और आस-पास के कारीगरों और बुनकरों को अपने कौशल का प्रदर्शन करने में सहायता मिलेगी, बल्कि उनका भविष्य भी उज्ज्वल होगा। पर्यटक इस केंद्र में पहुंचेंगे तो उससे राज्य की अर्थव्यवस्था को भी गति मिलेगी। यही नहीं, इस केंद्र को इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी (IGNOU) और राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (NIOS) से जोड़ा गया है। इसके तहत यहां बुनकरों और कारीगरों के बच्चे शिक्षा भी प्राप्त कर सकेंगे, जिसकी 75 फीसदी फीस भारत सरकार वहन करेगी। कारीगरों और बुनकरों को और सशक्त बनाने के लिए लोन की भी व्यवस्था की गई है। जाहिर है, वाराणसी के हस्तशिल्प, हथकरघा और रेशम उद्योगों को भी इससे बढ़ावा मिलना शुरू हो गया है।

 

विदेशों से प्राचीन धरोहरों को वापस लाना

नरेन्द्र मोदी अक्सर अपने भाषणों में कहते हैं, “हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि ‘राष्ट्रयाम जाग्रयाम वयम’ ; Eternal Vigilance Is The Price Of Liberty, हमें हर पल सजग रहना चाहिए। हमें अपनी विरासत के लिए हर पल कार्य करना चाहिए।” इसी विचारधारा के अनुरूप प्रधानमंत्री अपनी विरासत के प्रति न सिर्फ सजग रहते हैं, बल्कि उसे सहेजने का भी निरंतर प्रयास करते हैं।

 इसी सिलसिले में एक बड़ी कोशिश है, भारत के पुरातात्विक महत्त्व की कृतियों को  वापस लाना, जो कि सरकारी उपेक्षा के चलते कभी विदेश से वापस लाया जा पाना संभव नहीं हो पाया। मोदी सरकार के सत्ता संभालने के बाद से अब तक करीब दो दर्जन प्राचीन और एंटीक वस्तुएं विदेश से वापस लाई जा चुकी हैं। ये वे वस्तुएं हैं, जिन्हें चुराकर या फिर लूटकर भारत से ले जाया गया था। विशेष बात यह है कि भारत सरकार की कोशिशों से अमेरिका हो या ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, जर्मनी या फिर सिंगापुर, सभी ने स्वेच्छा से इन वस्तुओं को लौटाया है। कई महत्वपूर्ण प्रतिमाएं जो वापस लाई गई हैं, उनमें प्रमुख हैं – तमिलनाडु के चोल वंश की श्रीदेवी की प्रतिमा, बाहुबली की धातु की प्रतिमा, संत मन्निक्कावचाका की कांस्य प्रतिमा, गणेश और पार्वती की धातु की प्रतिमाएं, अमेरिका से दुर्गा की पत्थर की प्रतिमा, नृत्य की भाव-भंगिमा में नटराज की पत्थर की एक प्रतिमा, ऑस्ट्रेलिया से बैठे हुए गौतम बुद्ध की एक मूर्ति और नटराज तथाअर्द्धनारीश्वर की प्रतिमाएं।

 

लोक-कला के माध्यम से स्वच्छता का संदेश

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का साफ मानना है,  “कला उस पत्‍थर में नहीं होती है, उस मिट्टी में नहीं होती है, उस कलम में नहीं होती है, उस कैनवास में नहीं होती है; कला उस कलाकार के दिल और दिमाग में पहले अध्‍यात्‍म की तरह जन्‍म लेती है।” ऐसे में कला को बढ़ावा देने के लिए यह जरूरी है कि कलाकार को मौका मिले और उसका संदर्भ प्रासंगिक हो।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस प्रकार लोक-संस्कृति और स्वच्छता को बढ़ावा देने की कोशिश की, उसका असर देश के अलग-अलग हिस्सों में प्रभावी रूप से नजर आया। कई रेलवे स्टेशनों को तो नागरिकों ने स्वच्छ तो किया ही, साथ ही वहां की दीवारों को भी स्थानीय चित्रकारी से सजा दिया। विशेष बात यह है कि प्रधानमंत्री स्वयं इन उदाहरणों की चर्चा कर न सिर्फ उन्हें प्रोत्साहित करने का कार्य करते हैं, बल्कि इसका पूरा क्रेडिट जन सामान्य को दे देते हैं।

एक बार उन्होंने कहा, “स्वच्छता का काम कहीं-न-कहीं, कुछ-न-कुछ चल ही रहा है, लेकिन अब उसमें नागरिक एक कदम और आगे बढ़ गए हैं। उन्होंने स्वच्छता के साथ सौन्दर्य को जोड़ा है। एक प्रकार से सोने पे सुहागा। खास करके यह बात नजर आ रही है, रेलवे स्टेशनों पर। इन दिनों देश के कई रेलवे स्टेशनों को वहां के स्थानीय नागरिक, स्थानीय कलाकार, Students – सजाने में लगे हैं। स्थानीय कला को केंद्र में रखते हुए दीवारों को पेंट करना, साइन-बोर्ड को कलात्मक ढंग से बनाना, लोगों को जागरूक करने वाली चीजें भी उसमें डालना, न जाने क्या-क्या कर रहे हैं! मुझे किसी ने बताया कि हजारीबाग स्टेशन पर आदिवासी महिलाओं ने वहां की स्थानीय सोहराई और कोहबर आर्ट की डिजाइन से पूरे रेलवे स्टेशन को ही सजा दिया है। ठाणे जिले के 300 से ज्यादा volunteers ने किंग सर्किल स्टेशन को सजाया, माटुंगा, बोरीवली, खार। इधर राजस्थान से भी बहुत सी खबरें आ रही हैं, सवाई माधोपुर, कोटा। ऐसा लग रहा है कि हमारे रेलवे स्टेशन अपने-आप में हमारी परम्पराओं की पहचान बन जाएंगे। हर कोई अब खिड़की से चाय-पकौड़े की लॉरी वालों को नहीं ढूंढ़ेगा, ट्रेन में बैठे-बैठे दीवारों पर देखेगा कि यहां की विशेषता क्या है। ये न रेलवे का Initiative था, न नरेन्द्र मोदी का था। ये नागरिकों का Initiative था।“

खास बात यह है कि स्वच्छता के इन अभियानों के लिए रेलवे को कोई खर्च नहीं करना पड़ा।

 

परंपरा-आधुनिकता के ताने-बाने को जोड़ना आवश्यक

प्रधानमंत्री अपनी संस्कृति, कला को संरक्षित करने के लिए उसे आधुनिकता से भी जोड़ना चाहते हैं। उनका साफ मानना है कि अगर वैश्विक परिदृश्य में खुद को बनाए रखना है तो उसमें समय के हिसाब से सकारात्मक बदलाव करना चाहिए। वे कहते हैं, ”हमारे पास जो परंपरागत कलाएं हैं, उस ताने को आधुनिक बाने के साथ कैसे जोड़ें? Handloom में ज्‍यादातर महिलाएं कार्यरत हैं। Handloom गांवों में है। समय की मांग है कि गांव का ताना global बाने के साथ कैसे जुड़े और गांव का ताना और global बाने का मिलन कैसे हो। समय की मांग है कि गरीबी का ताना और अमीरी का बाना, दोनों को जोड़ कर हम आर्थिक समृद्धि की दिशा में Handloom को आगे बढ़ाएं।“

प्रधानमंत्री अपनी संस्कृति को आधुनिकता से जोड़ने के लिए चौतरफा प्रयास कर रहे हैं। उत्सवों का आयोजन हो या फिर केंद्र की स्थापना करके कला को संस्थागत रूप देना अथवा फिर आर्थिक मदद द्वारा उसे बढ़ावा देना। प्रधानमंत्री इन प्रयासों के जरिये संस्कृति के पुनर्जागरण की कोशिश में जुटे हैं।

 

लोक-संगीत और शास्त्रीय संगीत को बढ़ावा

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारतीय संगीत के प्रचार-प्रसार पर भी जोर देते हैं। उनके मुताबिक  विरासत में मिला भारतीय संगीत इस देश के लिए, हम सभी के लिए आशीर्वाद की तरह है। एक बड़ी सांस्कृतिक विरासत है। उसकी अपनी शक्ति है, ऊर्जा है। जहां भी अवसर मिलता है, वे इसके बारे में चर्चा करना नहीं भूलते। यहां तक कि अपने समक्ष होने वाली लोक संस्कृति की प्रस्तुतियों को भी वे केवल औपचारिकता नहीं मानते, बल्कि आत्मीयता का रूप दे देते हैं। मेघालय में खासी समुदाय के साथ ड्रम बजाना हो या फिर जापानी ढोलवादकों के साथ जुगलबंदी, मंगोलिया में वहां के पारंपरिक वाद्य यंत्र ‘मोरिन खुर’ बजाना हो या फिर स्कूली बच्चों के साथ बांसुरी बजाना – प्रधानमंत्री की इस सरलता का प्रभाव ही अनोखा होता है। यही नहीं, वे लोक संगीत के प्रचार-प्रसार से जुड़ी छोटी-छोटी बातों में भी खुद को शामिल कर लेते हैं –

  • 31 अगस्त, 2015 को प्रधानमंत्री मोदी ने रामचरितमानस का डिजिटल संस्करण जारी किया। इसे आकाशवाणी ने तैयार किया था।
  • वाराणसी में जापान के सहयोग से 140 करोड़ रुपये में कन्वेंशन सेंटर बनाने का निर्णय किया गया। ये कन्वेंशन सेंटर ‘संगीत तीर्थ’ केरूप में खास तौर पर बनाया जा रहा है। देश में अपने-आप में अनूठा होने के साथ ही यह जापानी तकनीक और वास्तुकला का नायाब नमूना भी होगा। इस सेंटर में बनारसी घराने के संगीत से लेकर हमारी असीम समृद्ध सांस्कृतिक धरोहरों को संजोया जाएगा।
  • 5 जून, 2017 को स्पिक मैके की स्थापना के अवसर पर 5वें अंतर्राष्ट्रीय कन्वेंशन का उद्घाटन किया।

आज जब भारत में अलगाववादी शक्तियां हावी होने के प्रयास में हैं, ऐसे में प्रधानमंत्री भारतीय संगीत और संस्कृति की भूमिका को और अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं। वे कहते हैं, “भारतीय संगीत, चाहे वह लोक संगीत हो, शास्त्रीय संगीत हो या फिर फिल्मी संगीत ही क्यों ना हो, उसने हमेशा देश और समाज को जोड़ने का काम किया है। धर्म-पंथ-जाति की सामाजिक दीवारों को तोड़कर सभी को एक स्वर में, एकजुट होकर, एक साथ रहने का संदेश संगीत ने दिया है। उत्तर का हिन्दुस्तानी संगीत, दक्षिण का कर्नाटक संगीत, बंगाल का रविन्द्र संगीत, असम का ज्योति-संगीत, जम्मू-कश्मीर का सूफी संगीत, इन सभी की नींव है- हमारी गंगा-जमुनी सभ्यता।“

प्रधानमंत्री मोदी के मुताबिक संगीत सिर्फ देश को जोड़ने का ही काम नहीं कर रहा है, बल्कि हमारा संगीत, हमारी कलाएं हमें अपनी प्रकृति को बचाने का भी अनवरत संदेश देती हैं।

साफ है, भारतीय संस्कृति को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की विचारधारा बाकी सरकारों से एकदम अलग है। वे संस्कृति के सभी आयामों पर समान रूप से ध्यान देना चाहते हैं। सभी के विकास पर चौतरफा प्रयास करना चाहते हैं। सरकार के प्रयासों को जन सामान्य से जोड़ना चाहते हैं। यही नहीं, प्रधानमंत्री मोदी ऐसे समारोहों में शामिल हो कर उसे प्रोत्साहित करने का प्रयास करते हैं, जिससे भारतीय संस्कृति की पहचान व्यापक स्तर पर स्थापित हो रही हो।

 

 

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