…तो मैं अपना भारतेंदु हरिश्चंद्र अवॉर्ड वापस कर दूंगा

आतंकवादी सिर्फ वही नहीं होते हैं जो सामान्य तौर पर आम लोगों के बीच खून-खराबा करते हैं, बल्कि इस देश में धीरे-धीरे ऐसे आतंकवादियों के चेहरे से भी नकाब उतर रहा है जिनके हाथ में कोई बंदूक या अत्याधुनिक हथियार नहीं, बल्कि कलम है। ये “बौद्धिक आतंकवादी” हैं। ये आतंकवादी भी विद्रोही किस्म के हैं। देश के लोकतंत्र को ध्वस्त कर देना चाहते हैं। ऐसा लगता है कि इन्हें इस बात पर कतई यकीन नहीं है आम जनता बहुमत से जो फैसला करती है, उसकी लोकतंत्र में इज्जत करनी चाहिए।

ये बौद्धिक आतंकवादी भले ही गिनती के हों, लेकिन इनको इस बात का गुमान है कि ये बहुमत से भी बड़े हैं। ये “बौद्धिक आतंकवादी” वो लोग हैं, जो सालों से साहित्य अकादमी के अवॉर्ड डकारते रहे, लेकिन आज जब इन्हें अवॉर्ड बांटने वालों के वजूद पर संकट पैदा हो रहा है, तो दर्द से तड़पने लगे हैं। ये “बौद्धिक आतंकवादी” वो लोग हैं, जो FTII में गजेंद्र चौहान का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि इन्हें डर है कि अगर ऐसी शख्सियत ने चेयरमैन की कुर्सी संभाल ली तो इनकी मठाधीशी पर खतरा पैदा हो जाएगा।

इन बौद्धिक आतंकवादियों खासकर साहित्य अकादमी अवॉर्ड वापस करने वाले लोगों से मेरा सवाल ये है कि आखिर ऐसी क्या परिस्थिति हो गई है कि अचानक ये साहित्यकार अपना अवॉर्ड वापस करने लगे हैं? क्या अपनी कलम से इस परिस्थिति का विरोध नहीं कर सकते थे?  इन साहित्यकारों का दर्द उस समय क्यों उफान पर नहीं आया, जब 1984 में हजारों सिखों का कत्लेआम हुआ? इन साहित्यकारों का सीना उस समय क्यों नहीं फट पड़ा, जब देश में भागलपुर, मेरठ, गोधरा कांड और गुजरात जैसे दंगे हुए?  इन बौद्धिक आतंकवादियों की बुद्धिमत्ता उस समय क्यों मारी गई, जब कश्मीर में हजारों कश्मीरी पंडितों को बेघर होना पड़ा? इन तथाकथित सेक्युलरवादियों की आंखें उस समय क्यों नहीं खुली, जब शाहबानो और तस्लीमा नसरीन के मुद्दे पर सरकार ने घुटने टेक दिए?

सच तो ये है कि ये ‘बौद्धिक आतंकवादी’ साहित्य के नाम पर सियासी छल कर रहे हैं। ये वो लोग हैं, जो ये अब तक पचा नहीं पा रहे हैं कि कैसे परंपरा से हटकर एक आम आदमी प्रधानमंत्री की गद्दी पर बैठ गया। सदियों से एक खास वर्ग के लोगों ने सत्ता पर राज किया है। इन्हीं सत्ताधारियों ने पाल पोसकर एक खास बौद्धिक वर्ग तैयार किया है। अब जब हमारे जैसे आम लोगों के बीच से उठकर आया मोदी नाम का प्रधानमंत्री एक-एक कर इनकी नसों पर हाथ रख रहा है, तो ये मिलकर प्रधानमंत्री मोदी और इनके बहाने देश की इमेज को खराब करने के लिए सामूहिक षडयंत्र रह रचे हैं।

ये साहित्य के नाम पर सियासत का ऐसा घिनौना खेल खेल रहे हैं, जिससे ये ध्वनि आ रही है कि मोदी तुमने भले ही देश में बहुमत हासिल कर लिया हो, लेकिन हम आराम से काम नहीं करने देंगे। आप बस देखते रहिए ये बौद्धिक आतंकवादी कई रूप में सामने आएंगे। कभी बॉलीवुड प्रतिनिधि बनकर, कभी साहित्यकार के तौर पर तो कभी एक्टिविस्ट, मानवाधिकार कार्यकर्ता या फिर RTI एक्टिविस्ट के तौर पर।

ऐसे माहौल में हम जैसे सामान्य लेखकों और पत्रकारों के लिए भी चुप रहना घातक है। इसलिए अब मैं भी शर्तिया ऐलान करता हूं कि अगर ऐसे बौद्धिक आतंकवादियों के आगे सरकार जरा सा भी झुकी तो मैं भारत सरकार द्वारा दिया गया भारतेंदु हरिश्चंद्र अवॉर्ड वापस कर दूंगा। सरकार से विनती ये है कि वो साहित्य अकादमी का सम्मान वापस कर रहे लोगों से न सिर्फ ये पुरस्कार ले, बल्कि इसके साथ दी गई राशि को वापस लेकर इसे गरीबों की भलाई के काम में लगाए।

लेखक हरीश चन्द्र बर्णवाल से आप इनके ईमेल से संपर्क कर सकते हैं – hcburnwal@gmail.com

Share

Be the first to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.


*