नरेंद्र मोदी का दिमाग कंप्यूटर से भी तेज चलता है..!

इस शीर्षक को पढ़कर ऐसा लग रहा होगा कि कहीं चाचा चौधरी पर लिखे लेख को तो नहीं पढ़ रहा हूं। लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। हां मैंने संदर्भ बिल्कुल वहीं से लिया है। लेकिन ये सब कुछ कहने के पीछे मेरे अपने तर्क हैं। इस तर्क को व्यवहारिकता की कसौटी में परखने की कोशिश करता हूं।

दरअसल, मैंने अपनी किताब ‘मोदी मंत्र’ की शुरुआत नरेंद्र मोदी के द्वारा बार-बार दोहराए जाने वाले एक बयान से की है। नरेंद्र मोदी अक्सर कहते हैं, ‘चीन में एक बहुत प्रचलित कहावत है और वो कहावत ये है कि कोई अगर एक साल के लिए सोचता है, तो अनाज बोता है, दस साल के लिए सोचता है, तो फल के वृक्ष बोता है, लेकिन अगर वो पीढ़ियों के लिए सोचता है, तो मनुष्य बोता है’।

यकीनन नरेंद्र मोदी का मकसद साफ है। वो इन दिनों प्रधानमंत्री के तौर पर मनुष्य को बोने में लगे हैं। आप उनके उठाए गए हर कदम को देखिए। उसमें आपको एक विजन की झलक मिलेगी। हालांकि आप ये समझ नहीं पाएंगे कि इसका प्रतिफल क्या मिलने वाला है औऱ उनकी सोच क्या है।

1. मोदी का कोई ऐसा काम नहीं है कि विपक्ष को उसकी आलोचना का मौका मिले। बल्कि विपक्ष उनके काम को खुद करने के लिए मजबूर हो जाएगा। स्वच्छता मिशन में शशि थरूर और अरविंद केजरीवाल की भागीदारी इसका सबूत है।

2.एक बार राहुल गांधी ने भले ही मोदी की आलोचना चीनी राष्ट्रपति की आवभगत को लेकर की। लेकिन सच तो ये है कि मोदी की वो अचंभित करने वाली सफलता थी। अहमदाबाद के साबरमती रिवरफ्रंट पर आवभगत कर मोदी ने भारत समेत पूरी दुनिया को ये दिखाया कि पर्यटन के लिहाज से साबरमती रिवरफ्रंट कितनी मुफीद जगह है।

3.नरेंद्र मोदी छोटी-छोटी बातों पर अपना ध्यान केंद्रित करके लोगों को आकर्षित करते हैं, क्योंकि ये वो बातें हैं जिनसे आपकी और हमारी जिंदगी पर फर्क पड़ता है। मसलन गेजेटेट अधिकारियों द्वारा अटेस्ट कराने की प्रथा खत्म करना हो, अधिकारियों को समय पर दफ्तर पहुंचाने के परंपरा की शुरुआत करनी हो।

4.नरेंद्र मोदी आम लोगों को भले ही खुश करते हों, लेकिन विपक्ष को हमेशा अचंभित करते हैं। जब तक विपक्ष उस मुद्दे पर आलोचना की वजह ढूंढता है, तब तक वो कोसों आगे निकल जाते हैं। मसलन जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी के जन्मदिवस को मनाने की बात करना किसी भी पार्टी के लिए सोच से परे की चीज है। खासकर उस कांग्रेस पार्टी के लिए जिसने सफाई अभियान में सहमति देने पर ही शशि थरूर को पार्टी के प्रवक्ता पद से बाहर कर दिया।

5.नरेंद्र मोदी मीडिया के माहिर खिलाड़ी बन चुके हैं। माहिर खिलाड़ी इसलिए बोल रहा हूं क्योंकि मीडिया ने बरसों नरेंद्र मोदी को बहुत सताया है। जाहिर है वो तपकर निकले हैं। हाल ही में मोदी की पत्रकारों के साथ बैठक के बहुत दूर तक मायने निकाले जा सकते हैं।

एक तो साफ है कि वो अपने दायित्व के आगे कतई निजी मीडिया को तवज्जो देने के मूड में नहीं है। ऊपर से जब वो मिलने पहुंचे तो सेल्फी लेने के चक्कर में मीडियाकर्मियों में जिस तरह की आपाधापी मची उससे भारी फजीहत हुई। कुल मिलाकर जिस मीडिया को मोदी सरकार की कमियां ढूंढनी थी। उसमें आपस में ही मतभेद पैदा हो रहे हैं।

6.ये बात नरेंद्र मोदी को भी पता है कि उन्हें जनादेश पांच साल के लिए मिला है, लेकिन क्या कभी आपने मोदी को ये कहते सुना है कि वो अगले पांच साल में क्या करेंगे। बल्कि हर मिशन के साथ उनका अपना समय फिक्स है। किसी काम के लिए 2-3 साल तो किसी काम के लिए 10-15 साल की बात करते हैं। उनका मतलब साफ है कि मोदी रहे न रहे, सिस्टम चलते रहना चाहिए।

7.मोदी न सिर्फ योजनाओं को बनाते हैं, बल्कि पूरे तामझाम के साथ उसमें जुट जाते हैं। इसके अलावा पूरी मशीनरी, आम लोगों से उस योजना के साथ जोड़ते हैं। इससे न सिर्फ उस योजना के लिए उन्हें सफलता मिलती है, बल्कि आम लोगों पर इसका व्यापक असर पड़ता है।

8.मोदी की एक सबसे बड़ी खासियत ये है कि वो हर काम का फॉलोअप रखते हैं। इसे एक अहम मोदी मंत्र कह सकता हूं। इसका मतलब ये है कि आप न सिर्फ काम शुरू करते हैं बल्कि उसे अंजाम तक पहुंचाते हैं। आदर्श ग्राम योजना हो, स्वच्छता अभियान हो या फिर जन धन योजना हो। हालांकि अभी इसका आकलन करने के लिए समय है। लेकिन जिस तरीके से हर जगह इस पर जोर देते हैं। इसे समझा जा सकता है।

9.नरेंद्र मोदी बदले की राजनीति में भरोसा नहीं करते। उन्होंने भले ही चुनाव के दौरान कई बातें कहीं, लेकिन खुद वो व्यक्तिगत रूप से बदला लेने में यकीन नहीं करते। वो कानून को अपना काम करने की खुली छूट देते हैं। खुद दखलंदाजी नहीं करते। अब तक के उदाहरण से ये साफ है। ये बातें लोगों को आश्चर्यचकित करती हैं।

10. मोदी का दिमाग कंप्यूटर से तेज इसलिए चलता है क्योंकि कंप्यूटर उतनी ही तेजी से दौड़ता है जितनी तेजी से दौड़ने की ताकत वैज्ञानिक उसमें भरते हैं। लेकिन मोदी एक सामान्य इंसान होते हुए भी इन वैज्ञानिकों को प्रभावित करने की ताकत रखते हैं। अपने काम से, अपने हुनर से इन वैज्ञानिकों का भी दिल जीतने की ताकत रखते हैं।

इस आखिरी प्वाइंट को आप हल्के में लेंगे तो भूल करेंगे। सच तो ये है कि मोदी न सिर्फ वैज्ञानिकों के छोटे-छोटे कार्यक्रमों में शरीक होते हैं, बल्कि दुनिया के हर उस छोटे से कार्यक्रम को अपना समर्थन देते हैं, जहां उन्हें लगता है कि इससे मानवता का भला होगा। असल में यही मोदी मंत्र है।

लेखक हरीश चन्द्र बर्णवाल से उनके ईमेल पर संपर्क कर सकते हैं – hcburnwal@gmail.com

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