मोदी विरोध की सनक में देश विरोध पर तो नहीं उतर आया विपक्ष?…इसलिए उठ रहे हैं सवाल!

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को बेइज्जत करने का विपक्ष के सारे नेता मिलकर कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते, चाहे इसके लिए देश की संसदीय परंपराओं को ध्वस्त करना पड़े, देशद्रोह को भी समर्थन क्यों नहीं करना पड़े या फिर चाहे देश की इज्जत पूरी दुनिया में क्यों न धूमिल करना पड़े। बिना किसी भूमिका के सीधे-सीधे कुछ उदाहरण के जरिये अपनी बात रख रहा हूं।

1-ये लगातार दूसरा मौका है जब राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर संशोधन प्रस्ताव पारित किया गया। जबकि सच तो ये है कि राष्ट्रपति अपने अभिभाषण में सिर्फ और सिर्फ सरकार का एजेंडा पेश करते हैं। इसमें राजनीति की कोई बात नहीं होती। राष्ट्रपति किसी दल का नहीं होता।

2-धर्मशाला में मैच न कराने का फैसला दरअसल पूरी दुनिया में ये साबित करने की कोशिश की गई है कि ये सब असहिष्णुता का असर है, ताकि मोदी को लेकर पूरा विश्व नए नजरिए से देखे। खास बात ये है कि ये सब जब हो रहा है तो खुद हिमाचल के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह बार-बार अपना बयान बदल रहे हैं। कभी कहते हैं कि सुरक्षा नहीं दे पाएंगे और कभी कहते हैं कि हम सुरक्षा तो दे देंगे, लेकिन लोगों की भावनाओं का ध्यान रखना चाहिए। हकीकत ये है कि इन सब ड्रामे के बीच पूरी दुनिया में इस बात की किरकिरी हुई कि क्या भारत में वर्ल्ड कप का एक मैच कराने में भी इतनी दिक्कत है। जिस पाकिस्तान में जाने से पूरी दुनिया कतराती है आज वो पाकिस्तान भी हमें आंख दिखाने की हिमाकत कर रहा है। इसकी वजह सुरक्षा को लेकर नहीं बल्कि सिर्फ और सिर्फ मोदी विरोध में है।

3-JNU में जिस तरीके से देशद्रोह के बयान का समर्थन किया गया और उसे अभिव्यक्ति की आजादी से जोड़ा गया। ये विचित्र ही नहीं घातक है। खास बात ये है कि कन्हैया और उसके गैंग का समर्थन करते हुए सिरे से इस बात को भुला दिया गया कि वहां देश को टुकड़े करने की बात कैमरे में कैद है। खुद हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी की है। लेकिन इसके बाद भी क्या हुआ कन्हैया JNU के अंदर फिर से वही जहरीली बातें उगल रहा है। प्रोफेसर भी ताल मिलाते हुए कह रहे हैं कि कश्मीर पर अवैध तरीके से कब्जा किया गया। मणिपुर और नागालैंड पर कब्जा किया गया। भारत को साम्राज्यवादी तक बताया गया। जरा सोचिए जो कांग्रेस आजादी के आंदोलन की लड़ाई में प्रमुखता से शामिल हुई, वो भी देशद्रोह के साथ खड़ी दिखाई देने लगी। विचित्र बात तो ये है कि JNU के छात्र संगठन से कांग्रेस का कोई लेना देना नहीं है, लेकिन मोदी विरोध में वो, लेफ्ट, केजरीवाल की पार्टी सब एक साथ हो गई। जरा सोचिए केरल और बंगाल में कांग्रेस क्या लेफ्ट के साथ गलबहियां करेगी। जाहिर तौर पर देशद्रोह के समर्थन में और मोदी का ये विरोध देश के लिए घातक सिद्ध होगा।

4-हाल के दिनों में चुनाव के वक्त जिस तरीके से अवॉर्ड वापसी का गैंग सक्रिय हुआ, और तमाम धार्मिक मुद्दों को उठाया गया। इसका असल मतलब अब धीरे-धीरे साफ हो रहा है। चुनाव के वक्त ये गैंग सिर्फ इसलिए सक्रिय हुआ ताकि मोदी के रथ को बिहार और बाकी राज्यों में थामा जा सके।

5-सहिष्णुता जैसे शब्द सिर्फ इसलिए गढ़े गए ताकि बाकी मुद्दों से लोगों का ध्यान हटाया जा सके। जरा सोचिए जिस भ्रष्टाचार के बारे में पिछले 10 वर्षों से बात हो रही थी, जिस विकास की गाड़ी को थाम लिया गया था। अब उस पर कोई बात भी नहीं करना चाहता। मुद्दा बदल रहे हैं।

सच तो ये है कि जिस मोदी को रोकने के लिए ये तमाम कवायद की जा रही है… राजनीतिक तौर पर भले ही ये सही हो सकती है। लेकिन अगर भारत देश के तौर पर बात करें तो ये अच्छी बात नहीं है। जब देश ने मोदी को पांच साल के लिए काम करने का मौका दिया है, तो कांग्रेस समेत तमाम दलों को चाहिए कि वो लोकतंत्र का सम्मान करते हुए कम से कम अच्छे कार्यों में सहयोग करें। फिर पांच साल बाद तो उन्हें मौका मिलेगा ही कि जनता के पास जाकर हिसाब-किताब दे सकें। लेकिन खतरनाक प्रवृत्ति ये दिखती है कि चूंकि कांग्रेस काम नहीं कर पाई तो कोई न कोई ऐसी कोशिश और साजिश की जाए ताकि ये भी काम न कर पाएं। यकीन मानिए ऐसी गलती कांग्रेस को 44 से 4 पर भी ला सकती है।

लेखक हरीश चन्द्र बर्णवाल से उनके ईमेल पर संपर्क कर सकते हैं – hcburnwal@gmail.com

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