जब पापा ने दो दिन यमराज का रास्ता रोका…

वो तारीख थी 19 जनवरी, 2019

शाम करीब 8 बजे का वक्त था।

  • मैं किसी जरूरी काम में लगा हुआ था। फोन उठाने तक की फुर्सत नहीं थी। लेकिन दीदी का फोन देखा तो फिर उठा लिया। बिना किसी भूमिका के दीदी की पहली लाइन थी, ‘’टिंकू (मेरा घर का नाम है) अगली जो भी फ्लाइट मिल रही हो, उससे घर आ जाओ।‘’ दीदी तब पश्चिम बंगाल के नियामतपुर में हमारे पैतृक स्थान में थीं।
  • “क्या हुआ दीदी? पापा ठीक तो हैं ना!” – पापा की पिछले कई दिनों से बिगड़ती सेहत की वजह से मैं शंका से भर गया।
  • “कुछ नहीं। लेकिन पापा बुला रहे हैं।” – दीदी ने कहा।
  • “एक बार पापा से बात करा दो ना” – मैं दीदी से अकस्मात यह कह बैठा, जिस पर दीदी ने कुछ नहीं कहा। हम दोनों शायद इस स्थिति को भांप चुके थे। हां थोड़ी देर बाद दीदी ने दो तस्वीरें मुझे व्हाट्स एप पर भेज दीं।

काम बहुत था। घर पहुंचते-पहुंचते रात के 11 बजे गए थे। अगली फ्लाइट सुबह 5 बजे की थी। फ्लाइट का टिकट बुक किया और एक बार फिर दीदी को फोन किया। दीदी जगी हुई थीं।

  • “दीदी कुछ बताओ ना, पापा से कुछ बात हुई क्या?” – मैंने दीदी से पूछा।
  • ‘’बेटा ऐसा लगा कि बम फूटा और हम ऊपर स्वर्ग चले गए। इसके बाद हमको कुछ याद आया। तो हम हरेराम, हरेराम, सीताराम, सीताराम पुकारने लगे। फिर उसके बाद नीचे आए हैं बेटा। दो दिन से लड़ाई चल रही है बेटा। बहुत लड़ाई हुई है। अब हम सरेंडर बोल दिए हैं बेटा।‘’ – दीदी एक सुर में बताए चली जा रही थीं।
  • ‘’ये क्या पापा से बात हो रही थी दीदी’’ – मैंने बीच में टोकते हुए पूछा।
  • दीदी ने बताया-‘हां, सुबह उनको फीवर था। उसी समय से एकदम कहीं गुम थे। फिर शाम को 5 बजे थोड़ा होश में आए। इसके बाद वो सबको अपने पास बुलाए। बिट्टू, सिट्टू, गुड्डू, पप्पू सबको बुलाए। सबको बताए कि मिल-जुलकर रहना बेटा। चारों भाई-बहन मिलकर रहना बेटा। अब हम यही कहते हैं कि मेरा समय अब खत्म हो गया है। पापा ये सब कहते चले जा रहे थे। तभी हम पूछे कि पापा किसी से मिलना है क्या – तब पापा यही बोले, टिंकू।‘’
  • ‘’अच्छा ऐसे कहे’’ – मैंने फिर पूछा।
  • ‘’हां’’ – दीदी ने कहा।

टिकट सुबह 5 बजे का ले चुका था। 2 बजे निकलना था। नींद का तो सवाल ही नहीं था। दीदी से हुई बातचीत एक बिंब बनकर दिलो दिमाग में कंपन पैदा कर रही थी। मैं अपने पैतृक शहर नियामतपुर के लिए निकल चुका था।

ठीक 20 वर्ष पूर्व ऐसे ही एक सफर में नियामतपुर के लिए निकला था। रास्ते में वही पुरानी स्मृतियां ताजा हो रही थीं।

सन् 1999 में नवंबर का वो दूसरा हफ्ता था। ये दूसरी दिवाली थी, जिसे मैंने अपने घर-परिवार से बाहर दिल्ली में अकेले ही बिताया था। पीसीओ बूथ पर लंबी लाइन से गुजरकर घर फोन करके अपने मन को और तकलीफ नहीं देना चाहता था। लेकिन न चाहते हुए भी कदम अपने आप बूथ की ओर चल पड़े। फोन घुमाया तो दूसरी तरफ से दीदी की आवाज आई।

  • दीदी ने कहा, ‘’जो भी ट्रेन मिले, जल्दी से जल्दी घर चले आओ।‘’ मैं हैरान-परेशान। दिवाली में मेरे न पहुंचने से मेरे साथ-साथ घरवाले भी परेशान होते थे, लेकिन दिवाली के ठीक एक दिन बाद बुलावा। सुनकर मन बैठ गया।
  • मैंने पूछा, “दीदी सब ठीक तो है ना।”
  • “हां, हां। लेकिन तुम फौरन घर चले आओ।” दीदी ने कहा।
  • ‘’लेकिन ऐसी क्या बात हो गई कि बिना रिजर्वेशन के घर आ जाऊं।‘’ मुझे किसी न किसी अनहोनी का डर सता रहा था।
  • “अरे बाबा। कुछ नहीं। इतनी जिद कर रहे हो तो बता देती हूं कि मां की तबीयत थोड़ी खराब है”, दीदी ने आगे कहा, “और वो तुम्हें बुला रही है।”
  • “अच्छा क्या हुआ। कहां है? बात कराओ।” मैंने एक ही सुर में कई सवाल पूछ डाले।

इसके बाद काफी देर तक टालमटोल करने के बाद दीदी ने आखिरकार इस हिदायत के साथ मां से बात कराई कि ज्यादा बोलने के लिए मजबूर मत करना। डॉक्टर ने मना किया है। मैंने मां की आवाज भर सुनी और तसल्ली हुई कि वो ठीक हैं। इसके बाद मैंने हडसन लाइन आकर अपने कमरे में थोड़े बहुत सामान को समेटा और सीधा नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंच गया। मैंने पहली बार सामान्य काउंटर पर इतनी लंबी लाइन देखी या फिर शायद मैं पहली बार ही लंबी दूरी की ट्रेन के टिकट के लिए सामान्य टिकट के काउंटर पर पहुंचा था। कुछ समझ में नहीं आया, लेकिन आधे-एक घंटे इंतजार करने के बाद समझ गया कि रिजर्वेशन तो छोड़िए, सामान्य टिकट भी नहीं खरीद सकता, ट्रेन छूट जाएगी।

इसके बाद रात 10.35 बजे की पुरुषोत्तम एक्सप्रेस को पकड़ने के लिए बिना टिकट लिए ही प्लेटफॉर्म पर पहुंच गया। प्लेटफॉर्म तक जाते समय अंदाजा हुआ कि मैंने अपने जीवन में इतनी भीड़ नहीं देखी थी। आखिर क्या हो गया? अधिकतर लोग दुखी। जैसे ही पुरुषोत्तम एक्सप्रेस के पास पहुंचा तो देखा कि सामान्य बॉगी तो छोड़िए रिजर्वेशन वाली बोगी में भी घुसना संभव नहीं था। मुझे लग रहा था कि रिजर्वेशन वाली बोगी में घुस जाऊंगा और टीटी को सौ-दो सौ रुपये देकर सीट ले लूंगा। लेकिन रिजर्वेशन वाली बोगी में ही घुसने में आधे घंटे लग गए। सभी खड़े ही थे, नीचे भी बैठने की जगह नहीं थी। बोगी में अधिकतर लोग रो रहे थे। काफी देर तक यही सोचता रहा कि मेरी मां बीमार है और दुखी पूरी दुनिया है। क्या इंसान का ये स्वभाव ही है कि जैसा सोचो, वैसा ही सब नजर आता है। मैं मां की बीमारी से दुखी हूं तो पूरी दुनिया ही दुखी नजर आ रही है। दुखी ही क्या, लोग रो भी रहे हैं। कोई और वजह तो नहीं है। कहीं ऐसा तो नहीं कि घर में कोई और परेशानी हो और मां का नाम लेकर बुलाया गया हो। या फिर कहीं मां को लेकर डॉक्टर ने कोई गंभीर टिप्पणी तो नहीं कर दी है। लेकिन क्या ट्रेन में बैठे सब लोगों की मां बीमार है। मुझे कुछ नहीं समझ में आ रहा था। जो कुछ मेरे सामने हो रहा था, उसे मेरी आंखें भी विश्वास नहीं कर पा रही थीं।

परंतु थोड़ी ही देर में पता चला कि ओडिशा में भयंकर तूफान आया है। इसमें करीब 30 हजार लोगों की मौत हो चुकी है। हालांकि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक मरने वालों की संख्या करीब 10 हजार थी। खैर, ये एक ऐसा सफर था, जिसमें अधिकतर यात्री रो रहे थे। पूरी यात्रा किसी बुरे सपने से कम नहीं थी। मुझे अपना दुख उनके दुख से कम लग रहा था। पुरुषोत्तम एक्सप्रेस सीधे पुरी जाती है। मैं गोमो में उतर गया और फिर वहां से पैसेंजर ट्रेन लेकर अपने घर रात में नियामतपुर पहुंचा। घर पहुंचा तो मां रोने लगी। मैं भी थोड़ी देर रोया। लेकिन मुझे लगा कि चलो मां तो ठीक है। मैंने पापा के बारे में पूछा तो पता चला कि असल में पापा की तबीयत खराब हो गई थी और उन्हें सीधे कोलकाता के कोलकाता मेडिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट में भर्ती कराना पड़ा है। मैं परेशान हुआ कि आखिर पापा को क्या हुआ है और मुझसे झूठ क्यों बोला गया तो घर के लोगों ने जानकारी दी कि अब पापा की तबीयत भी ठीक हो रही है और झूठ इसलिए बोला ताकि मैं हदस न जाऊं।

सुबह-सुबह हावड़ा की ट्रेन कोलफील्ड एक्सप्रेस पकड़कर करीब पौने तीन सौ किलोमीटर दूर कोलकाता पहुंचा और सीधे सीएमआरआई यानि कोलकाता मेडिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट हॉस्पिटल में पापा को देखकर ही मुझे चैन आया। जिस वक्त पापा से हॉस्पिटल में सामना हुआ, उस समय वो डॉक्टर पर ही बरस रहे थे कि आखिर उनके लिए अलग से टीवी क्यों नहीं है? उन्हें क्रिकेट देखना है। तब पहली बार पता चला कि पापा को क्रिकेट को लेकर कितना शौक पैदा हो गया है। दरअसल बचपन में मुझे क्रिकेट देखने को नहीं मिलता था तो मैंने इसका हल इस प्रकार ढूंढ़ा कि धीरे-धीरे क्रिकेट के प्रति पापा की रुचि पैदा कर दी थी। इसके बाद मैं पापा के साथ बैठकर ही क्रिकेट देखता था। हालांकि अब मुझे लगता है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि पापा ने मेरे लिए क्रिकेट के प्रति अपने शौक को पैदा किया हो। आखिर पापा ने कभी मेरी इच्छा को दरकिनार नहीं किया, बल्कि हमेशा मेरे शौक को पूरा करने में लगे रहे। मुझे हमेशा महसूस हुआ कि पापा मुझे सबसे ज्यादा मानते थे। अब उसका एक स्वरूप अस्पताल में देखने को मिल रहा था। जब क्रिकेट को लेकर पापा के शौक को अस्पताल में देखा।

अस्पताल में पापा के साथ कई घंटे बिताए। वहीं अस्पताल के बगल में जीजाजी के साथ एक कमरा ले लिया। यह तय हो गया था कि अब पापा के ठीक होने के बाद ही हमलोग साथ वापस लौटेंगे। इसी दौरान एक बार जब अस्पताल में मैं और पापा अकेले में थे तो मैंने पापा से शिकायत की कि पापा आपकी तबीयत ठीक नहीं थी और मुझे इसका पता भी नहीं चला। आपको जब अस्पताल में भर्ती कर दिया गया तब मुझे बताया गया।

  • तब पापा ने कहा – “बेटा ऐसी तबीयत बिगड़ी नहीं थी। तुम जानते हो कि पहली बार किसी डॉक्टर को दिखाने आया हूं। और सीधा हॉस्पिटलाइज्ड होना पड़ा।”
  • “लेकिन फिर भी” – मैंने बीच में टोकना चाहा।
  • “अगर कभी ऐसी नौबत आएगी तो मैं तुम्हें हवाई जहाज से बुलवा लूंगा। मेरी तबीयत इतनी खराब नहीं थी। इसीलिए मैंने खुद ही कहा था कि टिंकू को आराम से बुला लेना।“ – पापा ने कहा।

उस समय हवाई जहाज का मतलब बहुत ही बड़ी लग्जरी था। किसी मध्यम वर्ग के लिए हवाई जहाज बहुत बड़ी बात होती थी। खैर, पापा ठीक हुए। मैं, जीजाजी और पापा वापस घर लौटे और मैं बाद में दिल्ली लौट आया।

इस घटना के करीब बीस साल बाद दीदी का फोन आया कि पापा बुला रहे हैं और जो पहली फ्लाइट मिले, उससे आ जाना। बार-बार व्हाट्स एप पर दीदी द्वारा भेजी गई पापा की तस्वीर देखता और रुआंसा हो जाता। क्या ये पापा की तस्वीर है। मुझे याद है कि आज भी जब खुद को कमजोर पाता हूं तो पापा की तस्वीर याद करता हूं। उनके संघर्ष को याद करता हूं। किस प्रकार वे गांव छोड़कर बिना बताए सैकड़ों किलोमीटर दूर आसनसोल आए। किस प्रकार चंद पैसा इकट्ठा कर वो आलू का एक बोरा खरीदते और 10-15 किलोमीटर दूर आकर सड़क किनारे आलू बेचते! किस प्रकार उन्होंने अपनी मेहनत से न केवल अपने घर को बसाया, बल्कि अपने भाई-बहनों की जिंदगी को भी संवारा। दादाजी की भी इच्छा पूरी की। आज अगर उन्होंने नियामतपुर जैसे छोटे से इलाके में एक सशक्त बिजनेसमैन के तौर पर अपनी उपस्थिति दर्ज की तो ये सब कुछ उनके संघर्ष और आत्ममनोबल की ही परिणति है।  उनका पूरा जीवन एक फिल्म की स्क्रिप्ट की तरह है। एक बार तो ऐसा वक्त भी आया जब पैसे की लड़ाई में पूरा परिवार बिखर गया था। छोटी बहन जो बोल नहीं पाती, वो लखनऊ में पढ़ती थी। दोनों भाई हॉस्टल में थे और एक बिजनेसमैन की शिकायत पर इनकम टैक्स की रेड पड़ गई थी। लेकिन उनकी ईमानदारी ने हमेशा उनके मनोबल को ऊंचा रखा। 15-20 साल पहले 2-3 बार 50 हजार से लेकर 2 लाख रुपये तक की पॉकेटमारी हो गई, लेकिन कभी उन्होंने अपना हौसला नहीं छोड़ा और अपनी मेहनत से पैसे कमाते रहे। लेकिन आज पापा की तस्वीर कैसी हो गई है… एक मजबूत कदकाठी का इंसान भी कितना कमजोर हो जाता है!

अभी एक महीने पहले 13 दिसंबर, 2018 को ही तो पापा दिल्ली आए थे। एम्स में सेकेंड ओपनियन लेना था। दुर्गापुर और बाकी जगह के डॉक्टर पूरी तरह से जवाब दे चुके थे। लेकिन उनकी जिजीविषा बाकी थी। वो कुछ साल और जीना चाहते थे। इसी उम्मीद में मैंने आस लगाई थी कि शायद एम्स से कुछ समाधान निकल जाए। लेकिन यहां भी दो डॉक्टरों ने जवाब दे दिया।

पापा ने खुद कहा कि अब उन्हें वापस लौटना है। इसके एक हफ्ते बाद ही 20 दिसंबर को पापा लौट गए थे। मुझे पहली बार पापा के चेहरे में नाउम्मीदी का भाव दिखा। पापा के चेहरे का भाव पूरी की पूरी एक कहानी बयां कर रहा था। अपनी आदत के अनुरूप मैं इस बार भी पापा के लौटते समय फोटो खिंचवा रहा था, सेल्फी ले रहा था। लेकिन पापा अलविदा कह रहे थे। पापा ने भरी-पूरी नजरों से मेरे फ्लैट को देखा। दोनों बच्चों श्रीशु और श्रीनु के साथ खूब खेला। उनकी नजरें सबसे दूर थीं। ऐसा लग रहा था कि वो हम सबसे कट रहे थे। शायद मोहमाया खत्म करना चाहते हों। वो रात के समय भी अकेले ही तीसरे रूम में अधिकतर सोना चाहते थे। जब भी रात में उनके पास पहुंचा, वे जगे हुए ही नजर आते थे। लेकिन हमेशा अलग-थलग रहने की कोशिश करते। जाते-जाते उन्होंने सबको इशारों-इशारों में ही अलविदा कहा। सब मोह-माया से दूर। उन्होंने कहा तो कुछ भी नहीं, लेकिन ये जता दिया कि अब ये दिल्ली की आखिरी यात्रा है।

उनके दिल्ली से नियामतपुर जाने के दो हफ्ते बाद ही फिर से दुर्गापुर में एडमिट करना पड़ा था। डॉक्टर ने पूरी तरह से जवाब दे दिया था। हार्ट की फंक्शनिंग 5-10 परसेंट बची थी। 20 साल पहले शुगर से शुरू हुई बीमारी दो साल पहले 2016 में हार्ट तक पहुंच गई थी। और दो साल के भीतर ही मल्टी आर्गन फेल्योर की तरफ। हालांकि दो साल पहले भी डॉक्टरों ने बचने की संभावना सिर्फ 5-10 परसेंट ही बताई थी। लेकिन तब भी दो साल वे सामान्य इंसान की तरह ही जमकर जिए। बीच-बीच में दिक्कत तो हुई, लेकिन कभी नहीं लगा कि वे अब हमारे बीच नहीं रहेंगे।

मैं अब तक दिल्ली की फ्लाइट से सुबह-सुबह 8 बजे तक कोलकाता पहुंच चुका था। अब कोलकाता से नियामतपुर का रास्ता 4-5 घंटे का था। इसलिए वोल्वो बस ली। अभी चार महीने में दूसरी बार पापा से मिलने के लिए नियामतपुर जा रहा था। जबकि छह महीने में दो बार पापा दिल्ली में मेरे नए फ्लैट में आ चुके थे। अक्टूबर में दुर्गापूजा के बाद जब नियामतपुर गया था तब मेरी खुद पापा से मिलने की इच्छा थी। लेकिन इस बार पापा ने मुझे बुलाया था। मेरे जीवन में ऐसा पहली बार हुआ था, जब पापा ने मुझे बुलाया था। ऐसे समय में न जाने क्यों बस की स्पीड भी धीमी लगने लगती है। मुझे याद है कि ठीक एक महीने पहले जब पापा-मां दिल्ली से नियामतपुर लौटने वाले थे तो उससे पहले वाली रात जब मैं ऑफिस से लौट रहा था तो मैंने उन्हें फोन कर पूछा था – “पापा कुछ लाना है क्या?”

  • “हां, यहां हीरालाल हलवाई की बालूशाही बहुत फेमस है, वो ले आना” – पापा ने मुझसे कहा था।
  • ये जानते हुए भी कि पापा का शुगर जानलेवा हो चुका है। मैंने हामी भरते हुए ये पूछा कि और कुछ लाना है क्या?
  • “और क्या लाओगे” – पापा ने उम्मीद भरे भाव से कहा।
  • “आप ही बताइए” – मैंने ये सोचकर पापा से पूछा कि वो और कोई मिठाई का नाम न ले लें।
  • फोन पर ही पापा की तरफ से मां की आवाज भी आ रही थी। वो शायद पापा को मना कर रही थीं कि मिठाई का नाम भी लेना ठीक नहीं है। इस पर पापा मां से गुस्सा भी हो रहे थे। पापा ने आगे कहा – “अगर बिना चीनी के कहीं राजभोग मिले तो वो भी ले आना।“ पापा जानते थे कि मैं कई होटल में शुगर फ्री राजभोग ढूंढ़ चुका हूं, लेकिन नहीं मिला। लेकिन फिर भी उन्होंने राजभोग का जिक्र किया। शायद वो जानते थे कि मैं उन्हें निराश नहीं करूंगा।

रास्ते में लौटते हुए मैं बालूशाही और राजभोग लेकर घर पहुंचा था तो मेरी पत्नी खूब गुस्सा हुई थी। लेकिन मैंने इतना ही कहा, ये पापा का आखिरी सफर है और शायद आखिरी इच्छा भी। पापा ने आज तक कभी कुछ खाने की इच्छा नहीं जताई। मैंने उन्हें कभी खाने-पीने का शौकीन नहीं देखा। बल्कि हमेशा ये देखा कि सुबह चाय-बिस्किट खाकर दुकान चले गए। फिर सीधा दोपहर में 2-3 बजे खाना खाया। और फिर रात का खाना। बीच में कभी कुछ नहीं। मैंने अपने जन्म से लेकर उनके आखिरी के कुछ वर्षों तक यही देखा। यही उनकी जीवनचर्या थी। कभी समोसा या तला-भूना और वो भी बाहर की चीज खाते नहीं देखा। लेकिन आखिर के कुछ महीनों में उनका स्वाद बदल गया था। शायद जबसे डॉक्टरों ने उनके खानपान पर पाबंदी लगाई तो उनका भी स्वभाव बदला। दरअसल कभी उन्हें बंदिशों में रहने की आदत नहीं थी। यही कारण है कि जब डॉक्टरों ने बंदिश लगाई तो वे उसका उल्टा ही करना चाहते थे। घर पहुंचते ही पत्नी ने बालूशाही को अच्छी तरह से पैक कर दिया ताकि उसे यहां के अलावा ट्रेन में भी खाने की गुंजाइश न रहे। पापा जब नियामतपुर पहुंच जाएं तभी उसे खा सकें। लेकिन मिठाई खाने की जब उन्होंने मुझसे ही इच्छा जाहिर कर दी तो फिर मजबूरी में मैंने राजभोग को गर्म पानी में डाल दिया। कुछ मिनट बाद उसे पापा को सर्व किया। पापा खाते ही मेरी बदमाशी समझ गए और इस भाव से देखा कि मुझसे ही शैतानी करते हो।

वोल्वो बस इस समय तक दो घंटे का सफर पूरा कर चुकी थी। रास्ते में बर्दवान-दुर्गापुर के बीच शायद किसी छोटे से होटल पर रुकी थी। वहां भी लोगों की भीड़ चमचम वाले की तरफ ज्यादा थी। शायद बंगाल में रहने वाले लोगों को मिठाइयां बहुत भाती हैं। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या खाऊं। लेकिन पापा की बात यादकर चमचम ही लिया। मेरे भीतर पापा जीवंत हो उठे थे। शायद उनको भी चमचम की अनुभूति हो। थोड़ी देर में बस की यात्रा एक बार फिर शुरू हो चुकी थी।

छह महीने पहले अगस्त में भी मेरे भांजे अंकु की सगाई में पापा दिल्ली आए थे। उस समय उन्होंने आने से पहले इच्छा जाहिर की थी कि इस बार उनकी दूसरी आंख के मोतियाबिंद का ऑपरेशन हो जाए। मुझे याद है कि कई वर्षों तक बोलने के बाद उन्होंने पहली बार पहली आंख का दिल्ली में ही मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराया था। उसी समय डॉक्टर ने कुछ महीने के बाद दूसरी आंख का भी ऑपरेशन कराने के लिए कहा था। लेकिन पापा ऑपरेशन के लिए सालों तक तैयार ही नहीं हुए। पिछले साल जब वे दिल्ली आते समय तैयार हुए तो मैंने उन्हें ले जाकर दिखाया। लेकिन डॉक्टर ने साफ कहा कि ब्लड पतली करने वाली दवाई दो दिन के लिए छोड़नी पड़ेगी। लेकिन हार्ट के डॉक्टर ने इसके लिए साफ मना कर दिया था। क्योंकि ये दवाई छोड़ना उनके लिए जानलेवा हो सकता था। इसलिए आंख का ऑपरेशन संभव नहीं हुआ। परंतु उस बार दिल्ली में कई दिन रहने के बाद जब वे बंगाल लौट रहे थे, तब काफी खुश थे। उन्हें दिल्ली में हमारा नया फ्लैट भी काफी अच्छा लगा था। शुरू में वो इसे खरीदने के लिए मना कर रहे थे, लेकिन जब यहां आकर खुद फ्लैट देख लिया तो उन्होंने बताया कि मेरा फैसला ठीक था।

इन्हीं पुरानी कहानियों की सिलसिलेवार स्मृतियों के साथ मैं अपने घर पहुंचा। सबसे पहले पापा के पास पहुंचकर उन्हें पैर छूकर प्रणाम किया। उन्होंने भी मुस्कुराकर मुझे आशीर्वाद दिया। उनकी मुस्कुराहट में उनके भीतर का दर्द साफ झलक रहा था। उनकी आंखें अब मायूसी का इशारा कर रही थीं। वो सहारा लेकर उठे।

उन्होंने मद्धम आवाज में हालचाल पूछा। सफर के बारे में पूछा। जो बातें उनकी जुबान से नहीं निकलीं, लेकिन उनकी आंखें साफ-साफ बयां कर रही थीं, वो यही थीं कि देखो मेरी अंतिम यात्रा शुरू हो चुकी है और वक्त रहते मैंने तुम्हें खुद बुलाया है। हालांकि पापा की तबीयत उतनी खराब नहीं लग रही थी, जितनी दीदी द्वारा भेजी हुई उस फोटो में दिख रही थी। पापा बातचीत भी कर रहे थे।

हालांकि एक बड़ा बदलाव ये था कि पापा अपने कमरे में पलंग पर नहीं लेटे हुए थे, बल्कि उनके लिए भैया ने अस्पताल वाला स्पेशल बेड मंगवा लिया गया था। जिसमें कि आगे और पीछे का हिस्सा उठाया जा सके। दरअसल पापा को उठने-बैठने में दिक्कत हो रही थी। इसलिए दो दिन पहले ही भैया ने इसे मंगवाया था। काफी देर तक जीजाजी, दीदी और बाकी लोगों के साथ बातचीत होती रही। पापा ये सारी बातचीत बड़े ध्यान से सुनते रहे। साथ ही ये भी ख्याल रखा कि आने के बाद मैंने चाय पी कि नहीं। कुछ खाया कि नहीं। इस दौरान रिश्तेदारों, परिचितों और आसपास के शहर भर के पड़ोसियों का आना-जाना लगा रहा। कई ऐसे रिश्तेदार या परिचित आए जो बरसों से नहीं मिले थे। कई ऐसे भी थे, जिनसे सालों पहले पारिवारिक मतभेद हो गया था, लेकिन वो भी आते-जाते रहे। मेरे घर पहुंचने के बाद से पापा के इर्द-गिर्द कोई न कोई हर वक्त बैठा हुआ था।

फिर दोपहर बाद एक वक्त ऐसा भी आया, जब पापा और मैं कमरे में अकेले थे। मैं पापा के हाथ को पकड़कर सहला रहा था। लेकिन उस समय पापा ने थोड़ा बल लगाकर मेरा हाथ भी पकड़ लिया। बोले –

  • “बेटा तुम आ गए। तुमसे मिल लिया। अब सारी इच्छा पूरी हो गई है।“
  • “जी पापा” – पापा की बात सुनकर मैं बस रो नहीं रहा था, लेकिन अंदर ही अंदर पूरी तरह से कलप रहा था और इस बात को पापा भी महसूस कर रहे थे।
  • “बेटा अब मेरा समय हो गया है।“ – पापा ने बोलना शुरू किया – “क्या तुम मुझसे कुछ कहना चाहते हो? या फिर तुम्हारी मुझसे कोई इच्छा बची है?”
  • “नहीं पापा, अब कौन सी इच्छा बची होगी। आपने तो सब कुछ दिया है। कभी कोई कमी महसूस नहीं होने दी। हर वक्त आपका आशीर्वाद लेकर घूमता हूं। और आपने इस लायक बना दिया कि अपनी इच्छाएं पूरी कर सकूं। बल्कि घर में सबको आपने इस लायक बना दिया।“

पापा ने किसी प्रकार सिर हिलाया।

  • “पापा, लेकिन अगर आप मुझसे कुछ कहना चाहते हैं तो कहिए।“ – मैंने पापा से कहा।
  • “मैं क्या कहूंगा। बेटा मैं तुम्हारी बात सुनकर खुश हूं। मुझे इस बात की भी खुशी है कि सभी बच्चे ठीक से सेट हो गए हैं। बस गुड़िया की चिंता है।“
  • “लेकिन पापा आपने हम तीन भाई-बहनों को इतना सक्षम बनाया है कि हम अपनी एक बहन का ख्याल रख सकते हैं।“
  • ये बात सुनकर पापा खुश हुए। फिर पापा ने कहा – “तुम लोग सब आपस में प्यार से रहना। कभी झगड़ा मत करना।“

पापा ने थोड़े-बहुत शब्दों का सहारा लेकर मेरा हाथ पकड़कर काफी देर तक समझाया। उनकी आंखों में अपने बच्चों को लेकर खुशी थी, लेकिन बिछड़ जाने का दर्द भी था। उनके चेहरे पर मुझसे बात कर संतोष का भाव था, लेकिन इस बात का दर्द भी छलक रहा था कि अब उनकी शारीरिक यात्रा खत्म होने वाली है। उनका शरीर अपने भरे-पूरे परिवार को देखकर पुलकित हो रहा था, लेकिन साथ ही साथ खुद के साथ को छूट जाने की पीड़ा भी स्पष्ट दिखाई दे रही थी। उनका हाथ मेरे हाथ को थामकर छत्रछाया दे रहा था, लेकिन उसकी पकड़ ढीली होती जा रही थी।

कुछ देर बाद दीदी और जीजाजी भी कमरे में आ चुके थे। बात ही बात में नाना जी का जिक्र हुआ। नानाजी उम्र की सेंचुरी पूरी होने वाली है। अब वो चल नहीं पाते, उठना भी मुश्किल है। लेकिन जीवंतता में कमी नहीं। सबसे बड़ी बात ये थी कि वो पापा से काफी दुरुस्त थे और चाहते थे कि उनकी उम्र पापा को लग जाए। नानाजी पापा से मिलना चाहते थे, लेकिन एक किलोमीटर दूर से कैसे उठाकर पापा के पास लाया जाए। खैर दीदी, जीजाजी और मैंने तय किया कि उन्हें लाया जाए। साथ में बिट्टी को लेकर गए। उस तरफ बिट्टू नानाजी को गोद में लेकर कार तक आया तो दूसरी तरफ मैं गोद में लेकर कार से अपने घर तक लाया। पापा और नानाजी की मुलाकात ऐसी थी मानो दो युग आपस में मिल रहे हों। नानाजी और पापा ने एक दूसरे को भरपूर देखा। काफी देर तक देखा। शब्द कम थे, लेकिन भावनाएं असीम थीं। दोनों की आंखों से आंसू निकले। ऐसा लगा मानो दोनों अपनी पुरानी स्मृतियों को ताजा कर रहे हों। एक-एक घटना फ्लैशबैक में घूम रही थीं। हम सब भाव-विभोर होकर दोनों को देख रहे थे।  करीब दो घंटे तक नानाजी पापा के साथ रहे। फिर हम लोग उन्हें वापस मामाजी के घर छोड़ आए।

शाम होते-होते फिर पूरा परिवार एक साथ था। पापा के साथ घर में कई रिश्तेदार थे। कुछ कई दिनों से वहां थे। सबने खूब बातचीत की। पापा भी इस बातचीत में बीच-बीच में कुछ बोलते थे। लेकिन ज्यादातर समय वो सुनते थे। सुनते क्या थे, अपनी अंतिम यात्रा की तैयारी कर रहे थे। लेकिन जीजाजी ने बताया कि आज उनकी तबीयत ठीक लग रही है। इससे एक दिन पहले पापा की तबीयत बहुत खराब थी। ऐसा लग रहा था कि वे किसी भी घड़ी दुनिया को छोड़ सकते हैं। दीदी ने बताया कि ठीक उसी समय पापा ने मुझे बुलावा भेजा। पापा ने दो दिनों तक मौत से लड़ाई लड़ी। उन्होंने बताया कि वे स्वर्ग जा चुके थे। वहां उनकी दो दिनों तक खूब लड़ाई हुई। और फिर एक ऐसा पल भी आया, जब उन्होंने सरेंडर करने का फैसला किया। शायद नियति से लड़कर उन्हें समझ में आ गया कि अब मोह-माया खत्म करने का समय आ चुका है। मां ने बताया कि मेरे आने से एक दिन पहले उनकी तबीयत काफी खराब हो गई थी, तब दोपहर में ही पापा ने घर के प्रत्येक सदस्य से अलग-अलग बात की थी। भैया, भाभी, दीदी, छोटी बहन, छोटे जीजाजी, चाचा – सबसे अलग-अलग बात की थी। सबको जीवन का ज्ञान दिया था। सबको प्यार से रहने की हिदायत दी थी। घर के सभी सदस्यों से बात करने का उपक्रम जब दोपहर तक पूरा हो गया तो शाम होते-होते उनकी तबीयत पूरी तरह से बिगड़ गई थी। घर के सभी लोगों को एहसास हो गया था कि पापा अब कुछ ही क्षणों के मेहमान हैं। लेकिन तभी पापा ने मुझसे मिलने की इच्छा जाहिर की। साथ ही कहा कि मुझे दिल्ली से बुलाया जाए। दीदी ने जब मुझे फोन किया था तो घर में सबको ये एहसास था कि शायद मैं उनसे मिल भी पाऊंगा या नहीं। लेकिन मेरे आने के बाद शाम को उनकी सेहत पहले से ठीक लग रही थी। जीजाजी समेत बाकी लोगों ने भी इस बात की पुष्टि की। जिस दिन मैं नियामतपुर पहुंचा, वो दिन 20 जनवरी था और इसी दिन बिट्टू का जन्मदिन भी होता है। पापा को अच्छा लगे, इसके लिए हमलोगों ने बिट्टू का बर्थडे भी मनाया। उसने पापा के सामने केक काटा और सबको खिलाया।

अगले दिन सुबह हुई। मैंने आने के बाद पापा से कहा था कि आपकी दाढ़ी बढ़ गई है। अच्छी नहीं लग रही है। चेहरा साफ रहेगा तो आप स्वस्थ दिखेंगे। अगले दिन पारिवारिक नाई को घर बुलाया गया। वो आकर पापा की दाढ़ी बनाने लगा। फिर पापा ने मुझे बुलाकर कहा कि मैं भी दाढ़ी बनवा लूं। मैं सुबह-सुबह चाय वगैरह पीने में लगा था तो पापा ने इशारे से कहा कि जल्दी आ जाओ। इसके सैलून खोलने का समय हो चुका है। अब ये लेट हो रहा है, इसलिए वो हड़बड़ी करेगा। मैंने सोचा कि बनवा लेता हूं। लेकिन मैं चूंकि फोम का इस्तेमाल करता हूं और नाई क्रीम लेकर आया था, तो मैंने उसे मना कर दिया। इसके बाद पापा ने कहा कि तुम भी दाढ़ी बना लो ताकि फ्रेश दिख सको। पापा के आग्रह पर मैंने खुद दाढ़ी बनाई।

इसके बाद पूरे दिन भर पापा के साथ बैठा रहा। काफी देर बातचीत हुई। पापा का मूड काफी अच्छा था। हालांकि वो काफी कम खाना खा रहे थे। खाने के नाम पर एक दो चम्मच चावल या दाल ले रहे थे। उनका उठना-बैठना काफी मुश्किल हो गया था। उनके स्वास्थ्य को देखते हुए मैंने वापसी का भी मन बना लिया। अगले दिन सुबह 7 बजे की फ्लाइट का टिकट बुक कर रहा था। तभी पापा ने पूछा कि क्या कर रहे हो। मैंने बताया कि कल दिल्ली की वापसी है। मेरे ये कहने पर पापा थोड़ा उदास हो गए। मैंने वजह पूछी तो कहने लगे कि “एक दिन और रुक सकते हो क्या?”

  • “हां पापा, आप जब तक कहें, मैं रुक जाऊंगा।“ – मैंने कहा।

पापा थोड़ी देर सोचने लगे। मुझे नहीं पता था कि वो क्या सोच रहे थे। उस समय मैंने इतना ही अंदाजा लगाया कि पापा भी यही सोच रहे होंगे कि आखिर वो मुझे कितने दिन रोक सकते हैं। लोकसभा चुनाव का समय सिर पर है। काम के लिए दिल्ली वापस जाना ही होगा।

  • “1-2 दिन देख लो। अगर दिक्कत न हो तो।“ काफी देर बाद पापा ने कहा।
  • “हां पापा, मैं दो दिन बाद का टिकट ले लेता हूं।“

इसके बाद पापा से बहुत देर बात हुई। शाम को वो थोड़े शांत-शांत भी दिख रहे थे।

फिर घर में सबने विचार किया कि कुछ ऐसा किया जाए जिससे पापा को अच्छा लगे। हमलोगों ने देखा है कि नॉन वेज को लेकर पापा हमेशा उत्सुक रहते हैं। वो भी तब जब घर में सारे लोग एक साथ जमा होते हैं। इसके लिए पापा से ही पैसा लिया गया। मां ने पापा की अलमारी से पैसे निकालकर दिए। फिर क्या था चिकन का ऑर्डर दिया गया। उसे लेने के लिए मैं और दीदी चिकन की दुकान पर पहुंचे। तभी घर से जीजाजी का फोन आया। उन्होंने कहा कि पापा बुला रहे हैं। दीदी और मैंने तय किया कि चिकन छोड़कर घर वापस लौटा जाए। घर पहुंचते ही पापा की तबीयत काफी खराब लग रही थी। पापा ने सबको बुलाने का संदेश दिया था। शाम 6 बजे तक धीरे-धीरे सारे लोग उनके पास जमा हो गए थे।

  • “मेरे जाने का टाइम हो गया है। ऊपर वाले का बुलावा आ गया है। अब जिसको जो पूजा करनी हो, कर लो।“ – पापा ने किसी तरह अपने शारीरिक कष्ट को सहते हुए ये बातें कहीं। पापा की इन बातों को सुनकर घर के सारे लोग रोने लगे।
  • “रोने का कोई फायदा नहीं है। भगवान से मनाओ कि शांति से चले जाएं।“ – पापा ने फिर कहा।
  • “क्या कुछ कहना चाहते हैं पापा” – भाभी ने पापा से पूछा।
  • “कुछ नहीं। गंगा जल और तुलसी जल, जो देना हो दे दो। जिसको आशीर्वाद लेना हो ले लो। अब समय हो गया है।“ – पापा ने फिर कहा।

तुरंत भाभी गंगा जल में तुलसी पत्ता डालकर ले आईं। इसके बाद घर के सभी लोगों ने बारी-बारी से चम्मच से पापा को गंगा जल पिलाना शुरू कर दिया।

  • “थोड़ा-थोड़ा मुंह में डालो। सबको देने दो। इतना नहीं पी पाऊंगा।“ – पापा ने गंगा जल मुंह में लेते हुए कहा। तब तक घर में बहुत सारे लोग जमा हो चुके थे।
  • जब ये विधान पूरा हो गया। तो पापा ने पूछा – “कोई बच तो नहीं गया?”

तभी जीजाजी ने सिंगापुर में रह रही भांजी और मुंबई में रह रहे भांजे से पापा की बात कराई। पापा ने दोनों को आशीर्वाद दिया।

इसके बाद मैंने दिल्ली में अपनी पत्नी से वीडियो कॉल पर बात कराई। पापा ने आशीर्वाद दिया। लेकिन ऐसा लगा कि वो कुछ ढूंढ़ रहे हैं। कुछ सोच रहे हैं। तभी मुझे ख्याल आया कि पत्नी के साथ मेरे दोनों बच्चे नहीं थे। उनसे बात नहीं हो पाई है। लेकिन तभी पत्नी ने श्रीशु और श्रीनु दोनों को बुलाकर वीडियो कॉल किया। दोनों बच्चों से बात करके पापा बहुत खुश हुए। दोनों को आशीर्वाद दिया। ये भी कहा कि अब संतोष हो गया है। वीडियो कॉल के आखिर में उन्होंने दोनों को काफी देर तक हाथ हिलाकर बाय-बाय भी किया।

  • “अब सब पूरा हो गया। सब कुछ हो गया।“ – पापा ने अपने आप से ही बात करते हुए कहा।

इस समय तक पापा की आंखें अजीबोगरीब तरह से मचल रही थीं। शायद वो किसी को ढूंढ़ रहे थे। हमलोगों ने पूछा कि “क्या हुआ पापा”

  • “अब रास्ता खाली करो। जाने का समय हो गया है।“ – पापा ने कहा
  • “कहां जाने का पापा?”
  • “और कहां …  अब जीवन यहीं तक … पूरा… ऊपर जाने… मनाओ… भगवान से … शांति से जाएं… रास्ता खाली करो…”

पापा जिस बेड पर लेटे हुए थे, उसके ठीक सामने दरवाजा था। लेकिन दरवाजे और पापा के बीच में कुछ लोग खड़े थे। उनको देखते हुए पापा ने ये बात कही। तुरंत वे सब दरवाजे के सामने से हट गए।

काफी देर तक पापा परेशान होते रहे। ऐसा लग रहा था कि उनकी आंखें किसी को ढूंढ़ रही थीं, किसी का इंतजार कर रही थीं। किसी अजनबी से बात कर रही थीं। किसी को ये बता रही थीं कि मैंने अपने जाने की पूरी तैयारी कर ली है। पूरा रास्ता साफ है।

पापा करीब एक घंटे तक काफी परेशान होते रहे। इसके बाद किसी ने घर में एक पंडित जी को बुला लिया। पंडित जी ने आते ही सुंदर कांड का पाठ करना शुरू कर दिया। इससे पापा को काफी आराम मिला। शारीरिक रूप से भले ही वो कष्ट में हों, लेकिन बाहर से उन्हें आराम मिल रहा था। इस दौरान उन्होंने भी भगवान का नाम लेना शुरू कर दिया। मां वैष्णो देवी के कई बार नाम लिए। ईश्वर को याद करना शुरू किया। उन्हें शांति मिल रही थी।

इस बीच उनसे जब किसी ने बात की तो उन्होंने यही कहा कि अब उनके जाने का समय पूरा हो चुका है। ईश्वर से प्रार्थना करो कि अच्छे से चले जाएं। शांति से चले जाएं। एकाध बार ये भी कहा कि वो चल चुका है…मुझे लेने के लिए आने वाला है।

करीब दो घंटे से अधिक समय में रामायण का पाठ पूरा हुआ। पंडित जी के जाने के बाद उनकी परेशानी फिर से थोड़ी बढ़ गई। फिर घर के लोगों ने तय किया कि उन्हें अस्पताल वाले बेड से हटाकर घर के पलंग पर सुला देना चाहिए। घर के लोगों ने मिलकर उन्हें पलंग पर लिटाया। पापा का शरीर धीरे-धीरे कमजोर पड़ता जा रहा था। वो अपने शरीर में हरकत करना चाहते थे, वो अपने हाथ-पैर हिलाना चाहते थे, लेकिन पूरी तरह से असहाय महसूस कर रहे थे। इसी दौरान खून की कुछ बूंदें भी उनके मुंह से बाहर निकलीं। हम लोगों ने कभी अपने जीवन में पापा को इतना कमजोर नहीं देखा। नियति के आगे हम सब विवश थे।

मुझे लगा कि पापा को भूख लग गई होगी। लेकिन कुछ लोगों ने बताया कि अब वो निगल भी नहीं पाएंगे। लेकिन फिर भी मैंने उनसे पूछा – “पापा कुछ खाएंगे या पीएंगे।“

पापा अच्छी तरह से सिर तो नहीं हिला सके, लेकिन उन्होंने आंखों के इशारे से बताया तो हम लोग तुरंत एक्टिव हो गए। अब तक वो कुछ भी लेने से मना कर रहे थे। तुरंत दूध में हॉरलिक्स मिलाकर लाया गया। मां उन्हें पिलाने के लिए साथ में बैठ गईं। पापा ने अपने ही हाथ में पतीला ले लिया और दूसरे हाथ से चम्मच पकड़ लिया। लेकिन दोनों हाथ कांप रहे थे। मां ने पतीला पकड़ लिया और मैंने चम्मच। पापा ने किसी तरह 2-3 चम्मच हॉरलिक्स पिया। बाद में कुछ चम्मच हमने पिलाया। लेकिन वो अपने ही हाथों से उसे पीना चाह रहे थे।

फिर हम लोगों ने ही भजन सुनाना शुरू कर दिया। पापा की आंखें बंद थीं। उनके मुंह से हल्की-हल्की आवाजें आ रही थीं। वो बीच-बीच में अपने शरीर को हिलाना भी चाह रहे थे। शायद एक ही जगह पर एक ही पोज में लेटे-लेटे शरीर अकड़ रहा हो। कभी उन्हें हम लोग बिठाते तो कभी लिटा देते। फिर उन्हें अचानक गर्मी लगने लगी। मौसम में ठंडक थी। लेकिन उन्हें गर्मी लगने लगी थी। पिछले कई महीनों से उन्होंने पंखा भी नहीं चलाया था। घर के दरवाजे और खिड़कियां भी अधिकतर समय इसलिए बंद रखते थे, क्योंकि उन्हें ज्यादा ठंड लगती थी।

लेकिन अचानक गर्मी लगने पर उन्होंने अपने कपड़े इधर-उधर खींचने शुरू कर दिए। हम लोगों ने उनके पैजामे को खोलकर उन्हें लुंगी पहना दी। लेकिन उन्हें गर्मी लग रही थी तो वे उसे भी हटाने लगे। फिर हम लोगों ने उन्हें निकर पहना दिया। इसके बाद भी जब गर्मी लगने लगी तो ठंड के समय में ही पंखा भी चलाना पड़ा। इसके बाद कभी उन्हें गर्मी का एहसास होता तो कभी ठंड का। इस बीच उन्होंने कई बार समय पूछा।

इस समय तक मध्य रात्रि हो चुकी थी। उनके शरीर की हलचल कम हो रही थी। शायद कमजोर पड़ रहा था। लेकिन दिलो-दिमाग से वे पूरी तरह जागृत थे। उनके हाव-भाव देखकर स्पष्ट हो रहा था कि उन्होंने अपने आप को पूरी तरह सरेंडर कर दिया है। बस किसी तरह सही समय का इंतजार कर रहे हैं। उन्होंने अपनी तैयारी पूरी कर ली है। घर के सभी लोगों से बातचीत हो चुकी है। अब समय इस मोहमाया से मुक्ति का है।

  • दीदी ने पापा से पूछा – “कोई कष्ट है क्या पापा”
  • “कष्ट ही कष्ट है।“ – पापा ने जवाब दिया।
  • “कुछ चाहते हैं क्या पापा” – दीदी ने फिर पूछा।
  • “ऊपर वाले से कहो, मैं अब शांति से चला जाऊं।“
  • “नहीं पापा, अभी आपको अगले महीने अंकु की शादी भी अटेंड करनी है। अभी कहां जाएंगे” – मैंने पापा से कहा। अंकु मेरा भांजा है, जिसकी शादी पहले से तय थी। लेकिन दीदी शादी की तैयारियों की जगह कई दिन से पापा के साथ ही थीं।

मेरी बात सुनकर पापा ने कुछ कहा। पूरा बोल तो नहीं पाए, लेकिन इतनी आवाज समझ में आई – “अब मेरा समय पूरा हो चुका है। तुम लोग अब शादी के लिए मेरा इंतजार नहीं करना।“

इस दौरान बीच में फिर से पापा के मुंह से खून की बूंदें गिरीं। मैं बहुत परेशान हुआ। तो मेरे छोटे मामा ने ढाढस बंधाते हुए कहा कि आखिरी समय में कहीं न कहीं से लीकेज होता है। हौसला रखो। यही जीवन है।

मैं पापा की उस हालत को देख नहीं पा रहा था। इसलिए मध्य रात्रि के बाद दूसरे कमरे में चला आया और एक कविता लिखी –

 

मेरे पापा…

जब मैं त्याग का सर्वोत्तम रूप होता हूं,

तो पापा होता हूं।

जब मैं आदर्श का प्रतिरूप होता हूं,

तो पापा होता हूं।

जब मैं कठोर अनुशासन की दीवार होता हूं,

तो पापा होता हूं।

जब मैं कभी मां के जैसा दिखता हूं,

तो पापा होता हूं।

जब मैं दुकान से थका-हारा घर लौटकर भी खुश होता हूं,

तो पापा होता हूं।

जब मैं भूखे रहकर भी पेट भरे होने की एक्टिंग करता हूं,

तो पापा होता हूं।

जब कभी गलतियों में भी विशिष्टता ढूंढ़ लेता हूं,

तो पापा होता हूं।

जब पीड़ा सहकर भी तुम्हारे लिए मुस्कुरा देता हूं,

तो पापा होता हूं।

कविता लिखने के बाद काफी देर अकेले में रोता रहा। उसके बाद फिर पापा के पास पहुंचा। पापा की हालत स्थिर थी। वो आंखें बंद करके लेटे थे। लेकिन वो जगे हुए थे। बीच में एक बार फिर उन्होंने समय पूछा और चुपचाप लेट गए। शायद उन्हें पता था कि अभी उनका समय पूरा नहीं हुआ है।

सच कहूं तो आज घटना के चार महीने बाद जब उन पलों को याद कर रहा हूं तो ऐसा लगता है कि उन्हें पहले से सब कुछ पता था। या कहें उन्होंने अपनी मौत की तारीख दो दिन आगे बढ़ा दी थी। उन्हें मेरे आने का इंतजार था। दो दिन पहले जब वो बहुत परेशान हो गए,  तब उन्होंने मुझे बुलावा भेजा। घर के सभी सदस्यों ने बताया कि ऐसा लग रहा था कि मैं पापा से मिल नहीं पाऊंगा। लेकिन पापा ने मेरे लिए अपने प्राण को त्यागने की तारीख दो दिन आगे बढ़ा दी थी। दीदी को उन्होंने बताया था कि वे काफी समय तक यमराज से लड़ते रहे। दो दिन की लड़ाई के बाद उन्होंने सरेंडर करने का फैसला किया। इसके बाद वो स्वर्ग से वापस लौटे। शायद वो सबसे मिलने की मोहलत लेकर लौटे। घर से सभी सदस्यों से मुलाकात की। और शाम होते-होते मुझे भी बुलावा भेजा। साफ दिख रहा था कि वो कई दिन पहले से ही इसकी तैयारी कर रहे थे। कहीं कोई गिला-शिकवा छोड़ने की नौबत नहीं। सबको जी भरकर जीवन का ज्ञान दिया। आपस में प्रेम से रहने की नसीहत दी। अपने आखिरी समय में भरा-पूरा घर परिवार उनके साथ ही था।

कविता लिखने के बाद एक बार फिर पापा के पास पहुंचा। पापा शांत चित्त थे। कभी-कभी बीच-बीच में उनके मुंह से आवाज आती थी। साफ नजर आता था कि वो होश में हैं, लेकिन ऐसा लग रहा था कि वो हमसे धीरे-धीरे दूर जा रहे हैं। एक बार फिर पापा से पूछा-

  • “पापा भूख लग गई होगी। कुछ भी खाए नहीं हैं।“
  • “टिंकू ऐसे वक्त में खाने की कोई इच्छा शेष नहीं रह जाती है। अंत समय ऐसा ही होता है।“ – छोटे मामा ने मुझसे कहा।

इस दौरान मैंने दीदी और जीजाजी से भी ये जानना चाहा कि अंत समय कैसा होता है। जीजाजी के पिताजी का निधन एक साल पहले ही हुआ है। उनके निधन के समय दोनों उनके पास ही थे। उन्होंने काफी कुछ बताया। लेकिन फिर भी मेरा मन घबरा रहा था। मैंने पापा से पूछा – “पापा कुछ खाएंगे?”

  • पापा ने सिर हिलाकर कहा – “हां”

फिर हम लोग एकदम सतर्क हो गए। पूछा कि दूध-ब्रेड खाएंगे तो उन्होंने फिर हां में जवाब दिया।

तुरंत एक ब्रेड दूध में डालकर लाया गया। पहले मां ने खिलाया। फिर पापा ने अपने हाथ से भी खाने की कोशिश की। लेकिन नहीं खा पा रहे थे तो मैंने अपने हाथ से खिलाया। दूध-ब्रेड खत्म हो गया तो मैंने फिर पूछा कि पापा और खाएंगे, तो उन्होंने फिर सिर हिलाया।

फिर उनके लिए दूध-ब्रेड लाया गया। लेकिन इस बार वो दो चम्मच ही खा सके। समय का पहिया आज कुछ ज्यादा ही धीमी गति से आगे बढ़ रहा था, जिसका गंतव्य अवश्यंभावी था। इस समय रात के दो बज रहे थे।

थोड़ी देर बाद ही पापा जीजाजी को देखकर कुछ कहने का प्रयास करने लगे। लेकिन ये क्या?

पापा बोल तो रहे हैं, लेकिन उनकी भाषा ही समझ में नहीं आ रही थी। ना पापा सही से बोल पा रहे थे और न ही जीजाजी या हम सबमें किसी को कुछ भी समझ में आ रहा था।

  • तभी मां ने कहा – “पापा ने घर के सभी सदस्यों से अलग-अलग बात की है। सिर्फ जीजाजी से अलग से बात करना रह गया है। पापा ने सबको कुछ न कुछ आशीर्वाद दिया है। सिर्फ जीजाजी से बात नहीं हो पाई। इसीलिए वो कुछ कहना चाह रहे हैं।“
  • “पापा कलम कॉपी दूं, कुछ लिखेंगे” – मैंने पूछा।

पापा ने सिर हिलाकर हामी भरी।

तुरंत कलम कॉपी लेकर आ गया। लेकिन ये क्या… पापा कलम भी पकड़ नहीं पा रहे थे। और जब कलम पकड़ी तो फिर सिर्फ एक लकीर ही खींच पाए।

पापा जीजाजी को देखकर जोर-जोर से पूरा दम लगाकर कुछ बोल रहे थे। लेकिन किसी को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। शायद पापा के आखिरी सफर का ये अंतिम पड़ाव था… लेकिन वो पूरी तरह होश में थे। उनकी शारीरिक ताकत खत्म होती जा रही थी, लेकिन उनका हौसला बरकरार था। उनकी आवाज भले ही लगातार मद्धम पड़ती जा रही थी, लेकिन उनका दिमाग पूरी तरह से काम कर रहा था। मौसम में ठंडक बढ़ रही थी, लेकिन पापा को गर्मी लग रही थी। पापा बोल नहीं पा रहे थे। पापा पूरी तरह से मायूस थे। उन्हें पता चल रहा था कि वो जो कुछ भी बताना चाह रहे हैं, वो किसी को भी समझ में नहीं आ रहा है। पापा के इस दर्द की अनुभूति अपने चरम पर पहुंच चुकी थी। घर के सदस्यों के आंसू सूख चुके थे। एक बार फिर हल्की ठंड के बावजूद कमरे का पंखा चलने लगा। इसके बाद भी जब गर्मी कम नहीं हुई तो सारी खिड़कियों को खोल दिया गया।

थोड़ी देर बाद अचानक पापा ने इशारे से दवाइयों की ओर उंगली से इशारा किया, तो हमलोगों को समझ में आ गया कि पापा शायद दवाइयों को खाना चाहते हैं। तुरंत मेरे भतीजे बिट्टू ने एक-एक कर सभी टैबलेट खिलाना शुरू किया। अब उनके लिए टैबलेट गटकना मुश्किल हो रहा था। हालांकि तब भी उन्होंने आधी-आधी टैबलेट सब ले ली। इसके बाद जब बिट्टू जाने लगा तो पापा ने पफ वाली दवाई की ओर इशारा किया। ये दवाई पापा तब लेते हैं, जब उन्हें सांस लेने में तकलीफ होती है। पापा को पफ वाली दवाई दी जाने लगी तो उन्होंने उस दवाई को अपने हाथ में ले लिया।

पापा ने एकाध बार कोशिश की, खुद से दबाकर गैस को मुंह में लेने की कोशिश की। लेकिन वो कामयाब नहीं हो पाए। फिर अचानक वो गुस्साने लगे। हमलोगों ने कोशिश की कि पफ की मशीन को दबाकर दवा दे दी जाए। लेकिन वो मशीन नहीं छोड़ रहे थे। साथ में गुस्सा भी जाहिर कर रहे थे। काफी देर बाद हम लोगों को समझ में आया कि मशीन में लगी दवाई खत्म हो चुकी है और वो उसे बदलने को कह रहे हैं। इसके बाद घर के लोगों ने नई दवाई को खोला। फिर उसे लगाकर दिया गया। पापा ने किसी प्रकार खुद से दो बार अंदर लेने की कोशिश की। इसके बाद 2-3 तकिए के सहारे से लेट गए।

इस दौरान ये साफ पता चल रहा था कि पापा ने जो आधी-आधी टैबलेट ली हैं, उसमें से थोड़ा हिस्सा अंदर गया और कुछ मुंह में ही पड़ा हुआ है।

  • थोड़ी देर बाद दीदी ने पूछा – “कैसा लग रहा है पापा”
  • “बहुत कष्ट है।“ – बहुत देर बाद पहली बार पापा की आवाज समझ में आई।
  • “भगवान का नाम लीजिए पापा”
  • “सीताराम, सीताराम, हे वैष्णो देवी, वैष्णो देवी।“

पापा नियमित रूप से ये नाम ले रहे थे। कभी कभी ये आवाज हमें भी स्पष्ट रूप से सुनाई पड़ रही थी।

  • कुछ देर बाद दीदी ने कहा – “किसी का इंतजार कर रहे हैं पापा”
  • “हां, बस हो गया। बस थोड़ी देर और…”

पापा की ये बातें हम सबके लिए तीर की तरह चुभीं। हर कोई मन ही मन रो रहा था। सिसक रहा था। सब असहाय थे। देश के अलग-अलग हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने दो साल पहले ही जवाब दे दिया था। उन्होंने उसी समय बचने की संभावना 5-10 प्रतिशत बताई थी। लेकिन पापा अपनी जीवंतता की वजह से हम सबके साथ हंसी-खुशी रहे। जबकि सच्चाई ये है कि एक-एक कर उनके शरीर का हिस्सा साथ छोड़ रहा था। बीस साल पहले शुगर से शुरू हुई बीमारी ने उनको तोड़ना शुरू कर दिया था। ठीक दो साल पहले हार्ट के ऑपरेशन के लिए दिल्ली के मेदांता और फिर बाद में मेट्रो हॉस्पिटल में भी इलाज हुआ। लेकिन एक महीने के भीतर ही ये सब फेल हो गया और उन्हें दुर्गापुर के हार्ट अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। कभी स्टेंट लगा तो कभी स्टेंट को हटाया गया। दो महीने में ही तीन बार एंजियोग्राफी हो गई। लेकिन सच ये है कि पापा ने कभी किसी को पता नहीं चलने दिया कि उन्हें कितना कष्ट हो रहा है। बस इशारों में ही कभी-कभी अपनी बात कह देते। कभी किसी को परेशान नहीं किया। कई बार लगता है कि वो इसलिए भी कम खाने लगे थे कि बार-बार शौच जाने के लिए किसी को परेशान न करना पड़े। हालांकि घर के सभी सदस्य हर समय उनके साथ होते। सच तो ये था कि दर्द अपने चरम पर था, लेकिन पापा सिर्फ और सिर्फ ईश्वर का नाम ले रहे थे। घर के सदस्यों से कह रहे थे, ‘‘प्रार्थना करो कि हम शांति से चले जाएं।‘’ ये सब देखकर मन घबरा रहा था। मैं बाहर निकल कर दूसरे रूम में आ गया। वहीं बैठे-बैठे मोबाइल पर मैंने ऐसी कविता लिखी, जो शायद कभी कोई बेटा अपने पिता के लिए न लिखे।

पापा अब चले जाओ

कि अब और आपका दुःख देखा नहीं जाता
पापा अब चले जाओ

कि आपकी सांसें आपके मनोबल का साथ नहीं दे रहीं

कि आपकी जिजीविषा के आगे मेडिकल साइंस ने सरेंडर कर दिया है
पापा अब चले जाओ

कि इससे पहले आप खुद को मजबूर समझने लगें
कि दर्जनों परिवार के रहते आप हौसला छोड़ दें
पापा अब चले जाओ

कि अब आपकी जबान पूरी तरह से लड़खड़ा गई है
कि अब आप अपने लिए निवाला तक नहीं निगल पा रहे

पापा अब चले जाओ

इससे पहले कि मौसम की ठंडक को गर्मी लग जाए

कि खुली खिड़कियां फिर से बंद होने लग जाएं
पापा अब चले जाओ

कि भाई-बहनों की नोक-झोंक भी बंद हो गई है
कि अब दुश्मनी की कसमें खाने वाले भी रो पड़े हैं
पापा अब चले जाओ

कि अब हमारी आंखों के आंसू भी सूख गए हैं
कि अब अनहोनी का डर भी खत्म हो गया है
पापा अब चले जाओ

अपने पिता के लिए इस कविता को लिखते समय भी मेरे हाथ नहीं कांपे। जब जाकर कमरे में देखा तो पापा शांत थे, लेकिन उनके शरीर का कुछ हिस्सा कांप रहा था। वो संयमित थे, लेकिन एक बेचैनी झलक रही थी। वो बेचैनी किसी के इंतजार की थी। वो पूरी तरह से तैयार थे, लेकिन शायद कुछ समय बच रहा था। उनके शरीर के भीतर का हर अंग अपना सर्वश्रेष्ठ देने की कोशिश कर रहा था। उनका हार्ट, लिवर समेत बाकी अंग 5-10% ही काम कर रहे थे, लेकिन पापा की खातिर अपना सर्वश्रेष्ठ दे रहे थे। उनके शरीर के भीतर एक युद्ध चल रहा था, लेकिन ऐसा लग रहा था कि अब उन्होंने दर्द पर पूरी तरह से काबू पा लिया है। आसपास बैठे लोगों के मन में अनिश्चितता भरी हुई थी, लेकिन पापा अब पूरी तरह से निश्चिंत थे।

फिर अचानक उन्होंने उठने की कोशिश की। हम लोगों ने मिलकर उन्हें उठाया। तौलिये में, बिछौने पर, कपड़े पर खून की बूंदों के निशान बिखरे हुए थे। वे थोड़ी देर बैठे रहे। आंखें बंद थीं, लेकिन वो पूरी तरह से न केवल जगे हुए थे, बल्कि पूरी तरह से होशोहवास में थे।

  • अब उन्होंने अपना सिर घड़ी की तरफ कर लिया। लेकिन शायद उन्हें समय समझ में नहीं आया। तो उन्होंने पूछा – “कितना बजा है?”
  • “पौने तीन पापा” – मैंने कहा। रात के पौने तीन बज गए थे। मैंने आगे पूछा – “कुछ करना है क्या पापा?”
  • हाथ हिलाकर उन्होंने इशारे से मना किया और बोले – “बस थोड़ी देर और…”

इसके बाद पापा ने लेटने की इच्छा जाहिर की। पापा लेटे हुए थे। हम लोगों ने भजन गाना शुरू कर दिया। घर के कुछ सदस्यों को सोने के लिए अलग कमरे में भी भेज दिया। अब कमरे में मैं, दीदी, जीजाजी, भैया मौजूद थे। थोड़ी देर में छोटे चाचा और चाची भी उठकर आए। अपने घर जाने के लिए तैयार हो गए थे। लेकिन कमरे में ही आकर बैठ गए।

पापा पलंग पर थे। जिस तरफ पापा का चेहरा था, उस तरफ दीदी बैठी हुई थीं और पीठ की साइड में मैं पलंग पर बैठा हुआ था। हम सब ईश्वर को स्मरण कर रहे थे। किसी को नहीं पता था कि कब क्या होने वाला है। पापा अभी दो दिन पहले ही यानि मेरे आने से पहले की रात में भी बहुत बीमार हो चुके थे। खाना-पीना छोड़ दिया था। ऐसा वो कई बार पहले भी कर चुके थे। लेकिन दो दिन पहले वाली हालत एकदम अलग थी। घर के सदस्यों ने भी आकलन कर लिया था कि शायद मैं अब पापा से नहीं मिल पाऊंगा।

पापा दिल्ली से ठीक एक महीने पहले ही लौटे थे। इसके बाद वो फिर बीमार पड़े और दो हफ्ते बाद ही उन्हें दुर्गापुर के हार्ट हॉस्पिटल में एडमिट करना पड़ा। डॉक्टर भी जानते थे कि अब कोई इलाज नहीं बचा है। घर के लोग भी जानते थे कि कोई फायदा नहीं होने वाला है। यहां तक कि पापा खुद ये समझ चुके थे कि अस्पताल में भर्ती होने से कोई लाभ नहीं होने वाला। डॉक्टरों ने इससे पहले भी कई बार जवाब दे दिया था। लेकिन पापा जानते थे कि चमत्कार होते हैं। उन्होंने अपने कर्मों से कई चमत्कार होते देखे थे। 1 दिन, 2 दिन, 3 दिन… कई दिन बीत चुके थे। लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। उनका स्वास्थ्य दिन-प्रतिदिन गिरता जा रहा था। वो कमजोर हो रहे थे, सांसें थम रही थीं। करीब 5 दिन बाद उन्होंने कहा कि अब दो दिन और ठहर कर देखेंगे। अगर इसके बाद भी कोई फायदा नहीं हुआ तो फिर घर वापस लौट चलेंगे। दो दिन और गुजर गए, लेकिन सेहत में कोई लाभ नहीं हुआ। इसके बाद पापा ने खुद तय कर लिया कि अब अस्पताल में रुकने का कोई फायदा नहीं है। वापस घर लौटना पड़ेगा। दीदी, भैया, बिट्टू सब पापा को अस्पताल से लेकर घर लौट रहे थे। पापा ने नजर भरकर अस्पताल को देखा और उसे अलविदा कह दिया। शायद ये तय कर लिया कि अब इस अस्पताल में आखिरी बार आया हूं। इससे तीन हफ्ते पहले ही दिल्ली को अलविदा कहा था। ये जानते थे और जता भी गए थे कि अब दिल्ली दूर हो रही है। एक बार फिर उन्होंने दुर्गापुर के अस्पताल को अलविदा कहा। यही तो वो अस्पताल है, जो पिछले दो साल से पापा के हर दुख को हर रहा था। पापा अस्पताल जाते समय जितने कमजोर थे, अस्पताल से लौटते समय और ज्यादा कमजोर हो चुके थे।

  • “पिंकू जरा गाड़ी रोकना” – पापा ने गाड़ी चला रहे भैया को अचानक गाड़ी रोकने के लिए कहा।

सब हैरान-परेशान कि अभी तो अस्पताल से निकले कुछ ही किलोमीटर हुए हैं। पापा क्या चाहते हैं?

  • “क्या हुआ पापा?” – दीदी ने पूछा
  • “बिट्टू जरा उतरना। देखो उस गली में आगे एक पकौड़े वाले की दुकान मिलेगी। जरा वहां से 20 रुपये के पकौड़े खरीदकर लाना।“ – पापा ने दीदी की बात पर बिना ध्यान दिए हुए बिट्टू से कहा। भैया और दीदी ने मूक सहमति दी, लेकिन बिट्टू बिना किसी की प्रतीक्षा किए अब तक निकल चुका था। थोड़ी देर में गरमा-गरम पकौड़े आ गए। सब जानते थे कि अब ये तले हुए पकौड़े पापा के लिए जहर बन चुके हैं। लेकिन कोई कुछ नहीं बोलना चाहता था। किसी को नहीं पता था कि उनकी कौन सी इच्छा आखिरी इच्छा साबित होने वाली है। पापा ने बिना किसी से कुछ पूछे एक पकौड़ा खाया, दूसरा पकौड़ा खाया… इसके बाद उन्हें ध्यान आया कि उन्होंने किसी से कुछ पूछा ही नहीं है। फिर दीदी को लेने के लिए कहा, बिट्टू से लेने के लिए कहा। भैया के लिए पूरा पैकेट आगे बढ़ा दिया। सब खाने से मना कर रहे थे। लेकिन पापा के ज्यादा आग्रह करने पर सबने 1-2 पकौड़े उठाए और उसे ही देर तक कुतरते रहे। दरअसल जब पापा के लिए पहली बार तेल मसाला पूरी तरह से बंद कर दिया गया था तो घर में भी सादा भोजन बनने लगा था। लेकिन पापा को ये खाना बिल्कुल ही पसंद नहीं आता था। दिल्ली को अलविदा कहते समय उन्होंने मिठाई खाने की इच्छा जाहिर की। दुर्गापुर के अस्पताल को अलविदा कहते समय उन्होंने पकौड़े खाए। पापा ने कभी जीवन में कोई बाहरी चीज नहीं खाई। हमेशा मना करते रहे। इस बात को लेकर हम लोगों को बुरा लगता था। शायद आज हर किसी को संतुष्ट कर लेना चाहते हों।

पापा इस समय भी गहरी निद्रा में थे। ऐसी निद्रा जो शायद मनुष्य को अपने आखिरी समय में ही नसीब होती है। वो इसे अपनी पूरी ताकत से झेलता है, एकबारगी उससे जीत भी लेता है, लेकिन फिर इसे बताने के लिए मौजूद नहीं होता। हालांकि कभी-कभी उनकी हल्की-हल्की आवाज आती। फिर एकदम से शांत हो जाती। पापा सो तो रहे थे, लेकिन उन्हें नींद नहीं आई थी। वो होश में तो थे, लेकिन वो किसी और ही दुनिया में गोते लगा रहे थे। मुझे ऐसा लगता है कि उनके जहन में वो सारी पुरानी घटनाएं फ्लैशबैक की तरह घूम रही थीं।

अभी चार दिन पहले ही की तो बात है। घर आने के बाद उन्होंने बरामदे में जाने की इच्छा जाहिर की थी। भैया, बिट्टू, सिट्टू और बाकी सदस्य मिलकर पापा को बरामदे में लेकर गए थे। वहीं से उन्होंने सब्जी भी खरीदी थी। सब्जी खरीदने के दौरान उन्होंने खुद से मोल-भाव भी किया था। दीदी ने पापा को मना किया तो उन्हें फिजूलखर्ची को लेकर ज्ञान भी दिया। लेकिन कौन जानता है कि पापा मोल-भाव करके सब्जी वाले से थोड़ी और बातचीत कर लेना चाहते हों। खैर, इस दौरान पापा ने दीदी को जीवन का बहुत सारा ज्ञान दे दिया। शायद भगवान के बनाए यही वो रिश्ते हैं, जहां इंसान सब कुछ जमा करता रह जाता है। इस उम्मीद में कि परिवार के साथ खुशियां मनाने में काम आएगा, लेकिन जब खुशियां मनाने का समय आता है तो कई सारे किंतु-परंतु सामने आ जाते हैं।

पापा को बरामदे में बैठे-बैठे कई घंटे बीत चुके थे। अब वो अंदर अपने कमरे में जाना चाहते थे, लेकिन ये क्या उनके लिए घर के अंदर जाना अब संभव ही नहीं हो पा रहा था। वो उठ ही नहीं पा रहे थे, चलना तो दूर की बात है। मां, दीदी और भाभी मिलकर भी ऐसा नहीं कर पाईं। इसके बाद भैया, दोनों बच्चे, छोटे जीजाजी भी साथ आ गए, तब जाकर वो अपने कमरे तक पहुंच पाए। पापा ने इस दौरान समझ लिया कि अब उनकी बची जिंदगी उनके कमरे तक ही सीमित होने जा रही है। उन्होंने भरी-पूरी नजरों से आसमान की ओर देखा। इस बार बरामदे को भी अलविदा कह दिया। वही बरामदा जो उनके जीवन का एक बड़ा हिस्सा बन चुका था। धूप हो या बरसात हो, सर्दी हो या गर्मी हो, ये बरामदा उनका सच्चा साथी था। हम लोग जब भी घर जाते तो पापा कंफर्टेबल होकर यही बात करते थे।

पापा अपने दायरे और भी सीमित करते जा रहे थे। पहले दिल्ली को अलविदा कहा। फिर दुर्गापुर के अस्पताल को अलविदा कहा। फिर घर के बरामदे को अलविदा कहा। अगली बारी बाथरूम की थी। बाथरूम जाना कष्टकर था। पापा किसी को भी परेशान नहीं करना चाहते थे। ऐसा लगता है कि उन्होंने यही सोचकर खाना भी कम कर दिया था। हालांकि पापा बार-बार यही कहते कि खाने का स्वाद मर चुका है। खाना उन्हें कोयले वाले चूल्हे की छाय (राख) की तरह लगता है। ऐसा वे कई साल से बता रहे थे। रोज लगभग 25-30 दवाइयों को खाने के बाद इंसान की क्या हालत होगी, अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं।

इस बीच पापा एकदम शांत से थे। पापा हिलना-डुलना चाहते तो थे, लेकिन वो पूरी तरह से असमर्थ हो चुके थे। यहां तक कि अब हाथ की उंगलियों को हिलाना भी उनके लिए एक बोझ सा बन गया था। अचानक 3 बजकर 45 मिनट पर उनके शरीर में तेज हलचल हुई। हम सबकी नजरें उनकी तरफ गईं। पापा ने अचानक पूरी ताकत लगाकर अपने शरीर को दूसरी तरफ पलट लिया। आज ऐसा पहली बार हुआ कि उन्होंने बिना किसी की मदद के करवट ले ली। अब तक वे दीदी की तरफ मुंह करके लेटे थे, अब उन्होंने खुद से करवट बदलकर मेरी तरफ मुंह कर लिया। हम सब अचंभित थे। अचानक पापा में इतनी ऊर्जा कहां से आई। करवट लेते ही उनका हाथ उनके चेहरे के पास आ गया। मैंने कहा दीदी – “पापा का हाथ दब न जाए… देखो ना उनको दर्द होगा… उनको सांस लेने में दिक्कत होगी…” सब मुझे चुप करा रहे थे…. मैंने कहा… “पापा को देखो…” तभी पापा ने पूरी ताकत के साथ जोरों से शरीर के अंदर सांस खींची… एक गहरी आवाज आई थी… और उसी सांस को वापस बाहर छोड़ दिया…. इसके बाद फिर दोबारा सांस नहीं ली… समय सुबह के 3 बजकर 46 मिनट हो रहे थे।

हम सब पापा को देख रहे थे, एकदम चुप… पापा शांत हो चुके थे… शरीर में कोई हलचल नहीं थी। आंखें शांत, गहरी निद्रा में… शायद कहीं चले गए हैं… शरीर तो वैसा का वैसा ही है… लेकिन अब उनमें शोर नहीं है। मंगलवार का वो दिन था। पूर्णिमा भी। कहते हैं ऐसा शुभ दिन बहुत कम होता है। पापा ने नियति के लिए आज का ही दिन चुना था। वो अपने बच्चे को दुखी नहीं देखना चाहते थे। कभी उन्होंने किसी का दिल नहीं दुखाया। वो हमेशा प्यार करते थे। पापा तो ऐसे ही होते हैं। सहसा मुझे पापा पर अपनी ही लिखी एक कविता याद आ रही थी-

 

पापा…

सुबह से शाम तक

घर से बाहर तक

पढ़ाई से खेल के मैदान तक

सबसे बड़ा बहाना

पापा ही तो थे

शरारत से सीखने तक

खेलने से लड़ने तक

मां की चुप्पी से दीदी की धमकी तक

सबसे बड़ा भय

पापा ही तो थे

कहीं भी चले जाने का गुमान हो

कुछ भी खरीद लेने का अभिमान हो

किसी से भी जीत लेने का स्वाभिमान हो

सबसे बड़ा हौसला

पापा ही तो थे

पूरा घर करुण-क्रंदन की लपेट में आ चुका था। हर कोई रो रहा था। कोई उनके गुण बता रहा था। मेरी अंतर्पीड़ा एक बार फिर शब्दों के मायाजाल में उलझ रही थी, जो मैंने लिखा, वो ये था-

 

मौत को हारते देखा है

मैंने पहली बार

मौत को हारते देखा है

मैंने पहली बार

यम को डरते देखा है

जब अस्पताल में डॉक्टर लाचार हो गए

सेहत के सामने रुपये भी बेकार हो गए

दवाइयों ने भी काम करने बंद कर दिए

जब पापा खुद अस्पताल से घर चल दिए

मैंने पहली बार

मौत को गिड़गिड़ाते देखा है

मैंने पहली बार

यम को डरते देखा है

दुर्गापुर से नियामतपुर का रास्ता डर रहा था

सफर कैसे कटेगा, ये सोचकर सहम रहा था

तली पकौड़ियां भी आखिरी दर्शन को पहुंची थीं

मोलभाव करने सब्जी वाला भी सिसक रहा था

मैंने पहली बार

मौत को घबराते देखा है

मैंने पहली बार

यम को डरते देखा है

समय रहते पापा ने हमें दिल्ली से बुलाया था

तसल्ली से बैठकर जीवन का ज्ञान सुनाया था

पापा ने ही कहा था, अब गंगाजल मुंह में डालो

जिनको लेना हो आशीर्वाद, बस तुरंत ले डालो

मैंने पहली बार

मृत्यु को इंतजार करते देखा है

मैंने पहली बार

यम को डरते देखा है

पापा ने ही कर्मकांड की सारी रस्में करवाईं

कोई कहीं छूट न जाए, इसकी भी याद दिलाई

गीता पाठ सुना, रामायण की चौपाइयां सुनीं

मेरे स्वरचित भजन उसी तल्लीनता से सुनीं

मैंने पहली बार

सांसों को बिलखते देखा है

मैंने पहली बार

यम को डरते देखा है

पापा ने हम सबको दूर हट जाने को कहा था

रास्ता खाली देकर यम को इशारा किया था

मगर ये क्या, यम तो इंतजार ही करता रहा

पापा ने कई बार घड़ी देखी, पर यम डरता रहा

मैंने पहली बार

मृत्यु शैया को डोलते देखा है

मैंने पहली बार

यम को डरते देखा है

दर्द ने कोशिश की थी कि पापा जी-भरकर रोएं

जज्बात ने जोर लगाया था, वो डर-डरकर जिएं

आंखों ने मिचौली की थी कि वे नजर से चूक जाएं

शरीर ने साजिश रची थी कि वो बेअसर हो जाएं

मैंने पहली बार

मौत को तड़पते देखा है

मैंने पहली बार

यम को डरते देखा है

पापा ने आखिरी दवाई ली, खाना भी खाया

एक नींद झपकी ली तो कपड़ा भी बदलवाया

आखिर में घड़ी देखकर अपनी नियति तय की

चुपचाप चले गए और यमलोक में दस्तक दी

मैंने पहली बार

ब्रह्म मुहूर्त को ढलते देखा है

मैंने पहली बार

यम को डरते देखा है

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